Tuesday, May 26, 2020

ये क्या हो रहा है?.. ..ऐसा तो नहीं सोचा था!ja


JAMMU PARIVARTAN 26-5-2020

अरुण कुमार कैहरबा
जिस दौर से आज हम गुजर रहे हैं, शायद उसके बारे में पहले किसी ने सोचा भी नहीं होगा। कोरोना वायरस दुनिया के लोगों की जान का दुश्मन बन जाएगा। वायरस से बचने के लिए दुनिया के नामी-गिरामी देशों को लॉकडाउन लगाना पड़ेगा। जहाज, रेल गाडिय़ां, बसें व वाहन नहीं चलेंगे। सडक़ें सुनसान व गांव-शहर वीरान हो जाएंगे। लोग अपने ही घरों में सिमट जाएंगे। लोगों का एक दूसरे से मिलना और इक_ा होना अपराध बन जाएगा। वे एक-दूसरे से कतराते फिरेंगे। सामाजिक एकता व मिलवर्तन के स्थान पर सामाजिक दूरी का प्रचार किया जाएगा। ये शेर तो जरूर सुना था- ‘कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।’ लेकिन ऐसा तो नहीं ही सोचा था कि एक दूसरे से गले मिलकर और हाथ मिलाकर अभिवादन करने की बजाय दूरी बनाते हुए हाथ जोड़ कर मुंह को मास्क से ढ़ांपे हुए अभिवादन करने की रिवायत शुरू होगी। एकांतवास व क्वारंटाइन जैसे शब्द हवा में यूं उछाले जाएंगे। शहरों व गांवों को युद्ध स्तर पर सेनिटाइज करने की जरूरत आएगी। ये सारी चीजें अप्रत्याशित रूप से हम होते हुए देख रहे हैं।
DEVPATH 25-5-2020

यही नहीं इसके बारे में भी किसने सोचा होगा कि शासक लोगों को जनता कफ्र्यू के बारे में बताएंगे और घर पर ही रहने की अहमियत समझाएंगे। घर पर ही रह कर पूरी तरह ऊब चुके लोगों को घंटियां, थालियां व बर्तन बजाकर मनोरंजन करने के लिए कहा जाएगा। फिर एक दिन कोरोना को भगाने के लिए नौ बज कर नौ मिनट पर दीप जलाने के लिए कह दिया जाएगा। कुछ लोग इस अपील पर इतने अधिक उत्साहित हो जाएंगे कि वे गलियों में उतर कर उन्माद से भरे नारे लगाते हुए आतिशबाजी करने लगेंगे। बम फोडऩे वाले उन्मादियों के लिए तो शायद कोरोना को भगाने और सबक सिखाने का यही एकमात्र तरीका रहा होगा, लेकिन बाद में वो ही लोग अपने आप को ठगा सा महसूस करेंगे।
कहां किसी ने सोचा था कि फिर से लोगों को भारत-पाक विभाजन के दौरान लोगों के उजडऩे जैसे दृश्य दिखाई देंगे। एक ही देश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर रोजी-रोटी कमाने वाले मजदूरों को प्रवासी मजदूर बताया  जाएगा। अपनी आंखों में सपने लेकर अपने गांव छोड़ कर शहरों में आए, झोंपडिय़ां व कच्चे मकान बनाकर रह रहे लोगों को अपने से लगने वाले घरों में रोटी नहीं मिल पाएगी। काम छिन जाएगा। सरकारें उनके लिए रोटी का प्रबंध नहीं कर पाएंगी। वे सैंकड़ों किलोमीटर की दूरी पैदल तय करके अपने घरों को जाने को मजबूर होंगे। छोटे बच्चों को गोद में उठाए, सामान की पोटलियों को कंधों पर लटकाए व गर्भवती महिलाओं को साथ लिए जब वे जाएंगे तो रास्ते में कोरोना योद्धा कहलाने वाले पुलिसकर्मी उनका लाठियों से स्वागत करेंगे। देश के विकास की रीढ़ कहलाने वाले मजदूर रेलगाडिय़ों के नीचे दबकर मरेंगे। भूखे मरेंगे। सडक़ों में गर्भवती महिला मजदूरों को बच्चे जनने पड़ेंगे। मजदूरों को ना तो ससम्मान भेजा जाएगा और ना ही जाने दिया जाएगा। उनके रूकने के लिए बहुत से स्थानों पर शिविर बनाए जाएंगे, लेकिन वहां ना तो भरपेट रोटी दी जाएगी और ना ही अन्य सुविधाएं। देश के लाखों लोग बेरोजगार और बेघर-बार हो जाएंगे। जो नेता उनकी वोट पाकर सत्ता की ऊंचाईयों तक पहुंचते हैं, वे नेता उन मजदूरों को इस तरह अपने ही हाल पर छोड़ देंगे।
हालांकि हमारे नेताओं का व्यवहार अप्रत्याशित नहीं है। हमें अनुमान था कि हमारे नेता देश पर आने वाली हर आपदा के समय राजनीति से बाज नहीं आएंगे। कुछ दल और नेता शारीरिक दूरी के स्थान पर लोगों को सामाजिक रूप से बांटने के लिए साम-दाम-दंड-भेद कोई भी तरीका अपनाएंगे। धर्म-सम्प्रदाय को गोटियां बनाकर खेलने में व्यस्त होंगे। ऐसे गहरे संकट के समय में अप्रत्याशित और प्रत्याशित के बीच में कुछ नया सोचने और करने का समय है। क्या हम सोच सकते हैं कि सडक़ों पर मरने के लिए मजबूर हो रहे लोग भी कुछ अप्रत्याशित कर बैठे तो क्या होगा?

Saturday, May 23, 2020

मैं बन्दा हिन्द वालों का हूँ है हिन्दोस्तां मेरा.....करतार सिंह सराभा

भगत सिंह सहित क्रांतिकारियों के प्रेरणापुंज: शहीद करतार सिंह सराभा

अरुण कुमार कैहरबा

सेवा देश दी जिंदड़ीए बड़ी ओखी,गल्लां करनियां ढेर सुखल्लियां ने।जिन्नां देश सेवा विच पैर

पाइयाउन्नां लख मुसीबतां झल्लियां ने।
करतार सिंह सराभा की ये पंक्तियां उनकी सोच, विचारों व कार्यों को दर्शाने वाली हैं। इन पंक्तियों में वे कोरी बातों से आगे बढ़ कर देश की सेवा के लिए लाखों मुसीबतें झेलने के लिए खुद को व युवाओं को तैयार रहने की बात कर रहे हैं। आजादी की लड़ाई में जिन भगत सिंह को शहीदे आजम कहा जाता है, उनके भी करतार सिंह प्रेरणास्रोत रहे। भगत सिंह करतार सिंह की फोटो हमेशा अपने पास रखते थे। जब उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया था, तब उनकी जेब से सराभा की फोटो मिली थी। भगत सिंह ने अपनी मां को सराभा की फोटो दिखाते हुए कहा था कि यह मेरे हीरो हैं। लेख के शुरू में दी गई करतार सिंह सराभा के गीत की ये पंक्तियां उधम सिंह हमेशा अपनी जेब में रखा करते थे।

भारत को आजाद करवाने और व्यापक परिवर्तन का लक्ष्य लेकर विदेशों में रह रहे भारतीयों द्वारा शुरू किया गया गदर आंदोलन आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस आंदोलन के अहम किरदारों में से एक हैं-करतार सिंह सराभा। छोटी-सी उम्र में ही उनके मन में भारत को आजाद करवाने की चाह बलवती हो उठी थी। शिक्षा हासिल करने के लिए अमेरिका में गए करतार सिंह वहां आजादी के लिए सक्रिय लोगों के सम्पर्क में आए और गदर पार्टी की नींव रखी गई तो पार्टी के अखबार का जिम्मा करतार सिंह को सौंपा गया। ‘शहीद उधम सिंह की आत्मकथा’ के लेखक सुभाष चन्द्र ने बताया है कि अखबार में सराभा बड़ा दिलचस्प विज्ञापन छापते थे- ‘जरूरत है जोशीले..बहादुर सैनिकों की। तनख्वाह-मौत, इनाम  -शहादत, पेंशन-आजादी, कार्यक्षेत्र-हिंदोस्तान।’


आजादी के सपने को साकार करने के लिए अनेक देशों की यात्रा करते हुए भारत पहुँचे और लोगों को लामबंद करना शुरू किया। क्रांतिकारी सरगर्मियों के कारण करतार ने साढ़े उन्नीस वर्ष की उम्र में ही हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया और देश के लिए कुर्बान होने वाले वीरों में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित करवाया।
पंजाब के लुधियाना शहर से करीब 15मील की दूरी पर स्थित सराभा गाँव में करतार सिंह का जन्म 24 मई, 1896 को माता साहिब कौर की कोख से हुआ। करतार के बचपन में ही पिता मंगल सिंह का देहांत हो गया था। करतार सिंह की एक छोटी बहन धन्न कौर भी थी। दोनों बहन-भाइयों का पालन-पोषण दादा बदन सिंह ने किया। करतार के तीन चाचा-बिशन सिंह, वीर सिंह व बख्शीश सिंह ऊंची सरकारी पदवियों पर काम कर रहे थे। करतार की प्रारंभिक शिक्षा लुधियाना के स्कूलों में हुई। बाद में उसे उड़ीसा में अपने चाचा के पास जाना पड़ा। उड़ीसा उन दिनों बंगाल प्रांत का हिस्सा था, जो राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक और सरगर्म था। वहां के माहौल में सराभा ने स्कूली शिक्षा के साथ अन्य ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढऩा भी शुरू किया। दसवीं कक्षा पास करने के उपरांत उसके परिवार ने उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए उसे अमेरिका भेजने का निर्णय लिया और 1 जनवरी, 1912 को सराभा ने अमेरिका की धरती पर पांव रखा। उस समय उसकी आयु पंद्रह वर्ष से कुछ महीने ही अधिक थी। किताबों से मिली चेतना के बाद अमेरिका जैसे आज़ाद देश में रहते हुए करतार के मन में राष्ट्रीय अस्मिता व आत्मसम्मान के साथ जीने की इच्छा पैदा हुई। एक बुजुर्ग महिला के घर में किराएदार के रूप में रहते हुए, जब अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर महिला द्वारा घर को फूलों व वीर नायकों के चित्रों से सजाया गया तो सराभा ने इसका कारण पूछा। महिला के यह बताने पर कि अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस पर नागरिक ऐसे ही घर सजा कर खुशी का इज़हार करते हैं तो सराभा के मन में भी यह भावना जागृत हुई कि हमारे देश की आज़ादी का दिन भी होना चाहिए।

अमेरिका में उन दिनों गोरे लोगों के नस्लीय भेदभाव से दुखी भारतीय मज़दूरों को संगठित करने के प्रयास चल रहे थे। करतार सिंह इस काम में लगे बाबा सोहन सिंह भकना, हरनाम सिंह टुंडीलाट व काशीराम व ज्वाला सिंह ठ_ीआं के सम्पर्क में आए। ज्वाला सिंह की प्रेरणा से वे बर्कले विश्वविद्यालय के विद्यार्थी हो गए। इस विश्वविद्यालय में पढ़ रहे भारतीय विद्यार्थी दिसंबर, 1912 में लाला हरदयाल के संपर्क में आए, जो उन्हें भाषण देने गए थे। लाला हरदयाल ने विद्यार्थियों के सामने भारत की गुलामी के संबंध में काफी जोशीला भाषण दिया। लाला हरदयाल और भाई परमानंद के विचारों से प्रभावित होकर धीरे-धीरे सराभा के मन में देशभक्ति की तीव्र भावनाएं जागृत हुईं और वह देश के लिए मर-मिटने का संकल्प लेने की ओर अग्रसर होने लगा।
ARTH PARKASH
21 अप्रैल, 1913 को कैलिफोर्निया में रह रहे भारतीयों ने एकत्र हो एक क्रांतिकारी संगठन गदर पार्टी की स्थापना की। गदर पार्टी का मुख्य उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष द्वारा भारत को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त करवाना और लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना करना था। 1 नवंबर, 1913 को इस पार्टी ने गदर नामक एक समाचार पत्र का प्रकाशन करना प्रारंभ किया। यह समाचार पत्र हिंदी और पंजाबी के अलावा बंगाली, गुजराती, पश्तो और उर्दू में भी प्रकाशित किया जाता था। गदर का सारा काम करतार सिंह ही देखते थे। यह समाचार पत्र सभी देशों में रह रहे भारतीयों तक पहुंचाया जाता था। इसका मुख्य उद्देश्य अंग्रेजी शासन की क्रूरता और हकीकत से लोगों को अवगत करना था। कुछ ही समय के अंदर गदर पार्टी और समाचार पत्र दोनों ही लोकप्रिय हो गए।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध के समय अंग्रेजी सेना युद्ध के कार्यों में अत्याधिक व्यस्त हो गई। इस अवसर का पूरा फायदा उठाते हुए गदर पार्टी ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी। करतार सिंह पार्टी के अन्य साथियों के साथ कोलम्बो होते हुए कलकत्ता पहुंचे। युगांतर के संपादक जतिन मुखर्जी के परिचय पत्र के साथ करतार सिंह रास बिहारी बोस से मिले। करतार सिंह ने बोस को बताया कि जल्द ही 20,000 अन्य गदर कार्यकर्ता भारत पहुंच सकते हैं। सरकार ने विभिन्न पोतों पर गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। इसके बावजूद लुधियाना के एक गाँव में गदर सदस्यों की सभा हुई। सभा में गतिविधियों के संचालन में आर्थिक संकट से निपटने की रणनीति बनाई गई। 25 जनवरी, 1915 को रास बिहारी बोस के आने के बाद 21 फरवरी से सक्रिय आंदोलन शुरू करना तय हुआ। एक मुखबिर ने अंग्रेजी पुलिस के सामने दल की योजना का भंडाफोड़ कर दिया। पुलिस ने कई गदर कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। इस अभियान की असफलता के बाद सभी लोगों ने अफगानिस्तान जाने की योजना बनाई। लेकिन बीच रास्ते में ही करतार सिंह ने अपने गिरफ्तार साथियों के पास वापिस लौटने का निर्णय कर लिया। 2 मार्च, 1915 को करतार सिंह अपने दो साथियों के साथ वापिस लायलपुर, चौकी संख्या-5 पहुंचे। वहाँ सेना के अफसरों से विद्रोह करते हुए उन्हें साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।
13 सितंबर, 1915 को करतार सिंह और उनके साथियों को लाहौर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। अंग्रेजों के विरुद्ध पहली साजिश में 24 लोगों को फांसी की सजा दी गई। विद्रोहियों में सबसे खतरनाक ठहराते हुए करतार सिंह को 16 नवंबर, 1915 को छह अन्य साथियों के साथ फांसी दे दी गई। करतार सिंह सराभा गदर पार्टी के उसी तरह नायक बने, जैसे बाद में 1925-31 के दौरान भगत सिंह क्रांतिकारी आंदोलन के महानायक बने। यह अस्वाभाविक नहीं है कि करतार सिंह सराभा ही भगत सिंह के सबसे लोकप्रिय नायक थे। भगत सिंह करतार सिंह की इस $गज़ल को अक्सर गुनगुनाया करते थे-

यहीं पाओगे महशर में जबां मेरी बयाँ मेरा,मैं बन्दा हिन्द वालों का हूँ है हिन्दोस्तां मेरा।मैं हिन्दी ठेठ हिन्दी जात हिन्दी नाम हिन्दी है,यही मजहब यही फिरका यही है खानदां मेरा।मैं इस उजड़े हुए भारत का यक मामूली जर्रा हूँ,यही बस इक पता मेरा यही नामो-निशाँ मेरा।मैं उठते-बैठते तेरे कदम लूँ चूम ऐ भारत!कहाँ किस्मत मेरी ऐसी नसीबा ये कहाँ मेरा।तेरी खिदमत में अय भारत! ये सर जाये ये जाँ जाये,तो समझूँगा कि मरना है हयाते-जादवां मेरा।
JAGMARG

Thursday, May 14, 2020

ARTICLE ON SHAHEED SUKHDEV JAYANTI

जयंती विशेष

बेमिसाल संगठनकर्ता साहसी क्रांतिकारी शहीद सुखदेव

अरुण कुमार कैहरबा

इन दिनों के राजनैतिक विमर्श में भारत की आजादी के बाद के 70 सालों पर काफी बल दिया जाता है। तरह-तरह के राजनैतिक जुमलों के शोरगुल में आजादी के लिए किए गए संघर्षों पर लोगों का कम ही ध्यान जाता है। जबकि उन संघर्षों और उसमें योगदान व बलिदान देने वाले योद्धाओं के जीवन व विचारों को ज्यादा पढ़े-समझे जाने की जरूरत है। आजादी की लड़ाई को याद करना भावुकता भरा कार्य नहीं है, बल्कि इससे मौजूदा दौर की चुनौतियों के संदर्भ में हम बेहतर ढ़ंग से अपनी भूमिकाओं की पहचान कर सकते हैं। आजादी की लड़ाई में जहां महात्मा गांधी की अगुवाई में निरंतर अपने स्वरूप को बदलता अहिंसावादी आंदोलन था। कांग्रेस पार्टी का नरम व गरम दल में बंटना था। वहीं शहीद भगत सिंह व साथियों की अगुवाई में प्रखर वैचारिकता से लबरेज क्रांतिकारी आंदोलन भी था। क्रांतिकारी आंदोलन में भगत सिंह अपनी अध्ययनशीलता, विचारशीलता, योजना निर्माण व जोशो-खरोश के साथ क्रियान्वयन में अग्रणी भूमिका के लिए जाने जाते हैं। लेकिन उनके अन्य साथी भी कोई कम नहीं थे। 23मार्च, 1931 को लाहौर की सेंट्रल जेल में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूलने वाले भगत सिंह के दूसरे साथी सुखदेव व राजगुरू भी बेमिसाल थे। सुखदेव की जयंती के उपलक्ष्य में आज हम उन्हीं के बारे में खासतौर से बात कर रहे हैं। 

सुखदेव का जन्म 15 मई, 1907 को लुधियाना पंजाब में हुआ। उनके पिता का नाम रामलाल थापर व मां का नाम रल्ली देवी है। पिता की मृत्यु के बाद उनका लालन-पालन उनके ताऊ लाला अचिंतराम ने किया। परिवार की देशभक्तिपूर्ण भावना व कार्यों का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। बताते हैं कि बचपन में जब उनके दोस्त खेल-कूद में व्यस्त रहते थे, सुखदेव अपने आस-पास के शिक्षा से वंचित बच्चों को पढ़ाते थे। जब सुखदेव खुद स्कूल में पढ़ते थे तो अंग्रेज अधिकारी वहां आए। प्रधानाध्यापक के आदेश पर सभी ने उन्हें सेल्यूट किया, लेकिन सुखदेव ने किसी अंग्रेज को प्रणाम नहीं करने की बात कह कर सेल्यूट करने से मना कर दिया। लायलपुर के एसडी हाई स्कूल से उन्होंने दसवीं करने के बाद नेशनल कॉलेज लाहौर में दाखिला लिया। वहीं पर उनकी भेंट भगत सिंह व अन्य साथियों से हुई। एक ही तरह के विचार होने के कारण शीघ्र ही भगत सिंह से उनकी गहरी दोस्ती हो गई। बाद में वे देश की आजादी के संघर्षों के सहयात्री हो गए। 1926 में दोनों ने अन्य युवाओं के साथ मिलकर लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया। सितंबर, 1928 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में देश के प्रमुख क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक हुई, जिसमें इस संगठन का नाम बदलकर हिन्दोस्तान सोशल रिपब्लिकन आर्मी कर दिया गया। सुखदेव को पंजाब के संगठन की जिम्मेदारी सौंपी गई। शिव वर्मा ने अपनी किताब संस्मृतियां में लिखा है- ‘भगत सिंह दल के राजनैतिक नेता थे और सुखदेव संगठनकर्ता, वे एक-एक ईंट रखकर इमारत खड़ी करने वाले थे। वे प्रत्येक सहयोगी की छोटी से छोटी आवश्यकता का भी पूरा ध्यान रखते थे।’ सुखदेव अपनी संगठन कुशलता के लिए जाने जाते हैं। 
भारत की राजनैतिक परिस्थितियों का अध्ययन करने के लिए अंग्रेजों ने भारत में साइमन कमीशन भेजा। कमीशन में एक भी भारतीय नहीं होने के कारण इसका जगह-जगह विरोध हुआ। पंजाब में लाला लाजपत राय की अगुवाई में इसके खिलाफ प्रदर्शन हुआ। एक विशाल जुलूस का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजों ने लाठीचार्ज कर दिया, जिसमें लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गए। नवंबर में उनका देहांत हो गया। इस पर पूरे पंजाब में तीखी प्रतिक्रिया हुई। भगत सिंह व सुखदेव ने लाठीचार्ज करवाने वाले अधिकारी स्कॉट को मारने की योजना बनाई। लेकिन उसकी जगह सांडर्स मारा गया। अंग्रेजों के दमनचक्र पर रोष जताने व भारतीयों की भावनाओं को नजरंदाज करने वाली गूंगी-बहरी अंग्रेजी सरकार के कानों तक आवाज पहुंचाने के लिए 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय असेंबली में बम धमाका कर दिया और गिरफ्तारी दे दी। इसी बीच लाहौर में बम बनाने की फैक्ट्री पकड़ी गई और 15 अप्रैल को सुखदेव व अन्य साथी भी गिरफ्तार हो गए। इस पर सुखदेव ने खासी खुशी का इजहार किया।
लाहौर षडय़ंत्र केस में हमिल्टन हार्डिंग द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के अनुसार कोर्ट में चले केस को ‘क्राउन बनाम सुखदेव व अन्य’ के नाम से चला। इस केस में हालांकि सुखदेव की सीधी भूमिका नहीं थी। लेकिन केस में उन्हें मुख्य अभियुक्त बनाकर उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका की महत्ता को ही रेखांकित किया गया। इस केस की निर्णय में कोर्ट ने कहा- ‘सुखदेव को साजिश का दिमाग कहा जा सकता है, जबकि भगत सिंह इसके दाहिने हाथ थे। सुखदेव एक व्यवस्था देखने वाले, सदस्यों की भर्ती करने और प्रत्येक की क्षमता के लिए उपयुक्त काम खोजने में उत्साही थे। वह हिंसा के कृत्यों में स्वयं भाग लेने में पिछड़े थे। लेकिन फिर भी उन्हें उन कार्यों के निष्पादन के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए जिनमें उनके दिमाग और संगठन शक्ति ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।’
इसकी जानकारी लोगों को बहुत कम है कि हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की केन्द्रीय कमेटी की बैठक में असेंबली में बम गिराने की जिम्मेदारी भगत सिंह को नहीं दी गई थी। कमेटी सदस्यों को खतरा था कि सांडर्स वध के मामले में पहले से पुलिस भगत सिंह की तलाश कर रही है। शिव वर्मा ने अपनी किताब संस्मृतियां में लिखा है कि एचएसआए की बैठक के तीन दिन बाद जब सुखदेव को पता चला तो बहुत नाराज हुए। वे जानते थे कि दल का मकसद भगत सिंह ही सबसे अच्छे ढ़ंग से रख सकते हैं। सुखदेव व भगत सिंह की इस मामले में तीखी चर्चा हुई। सुखदेव ने भगत सिंह को कायर तक कह दिया। अंत में कमेटी को अपना फैसला बदलना पड़ा और असेंबली में बम फेंकने की जिम्मेदारी में भगत सिंह को शामिल करना पड़ा। शिव वर्मा कहते हैं कि इस तरह से सुखदेव ने अपने प्रिय मित्र को मौत के जबड़े में धकेल दिया था। भगत सिंह के साथ तीखी चर्चा के बाद शाम को सुखदेव लाहौर के लिए रवाना हो गए। अगले दिन जब वे लाहौर पहुंचे तो दुर्गा भाभी के अनुसार उसकी आंखें सूजी हुई थी। दरअसल अपने निर्णय के बाद सुखदेव फूट-फूट कर रोया था। वह जानता था कि असेंबली में बम फेंक और गिरफ्तारी देकर भगत सिंह सबसे बेहतर कार्य कर सकता था। लेकिन अपने दोस्त को मौत के मुंह में धकेलने का उसे गम भी था। इस प्रकार जहां सुखदेव पत्थर से अधिक कठोर हैं तो फूल से भी अधिक कोमल हैं।
फांसी के निर्णय के बाद जब लोग उन्हें फांसी से कम सजा के लिए आंदोलन करने लगे तो उन्होंने कहा था- ‘हमारी सजा को बदल देने से देश का उतना कल्याण नहीं होगा, जितना फांसी पर चढऩे से।’ फांसी से कुछ समय पहले सुखदेव द्वारा महात्मा गांधी को लिखे पत्र में उनके विचारों की बानगी देखने को मिलती है। सुखदेव का वह पत्र उनके व्यवस्थित व तार्किक विचारों का दस्तावेज है।
अरुण कुमार कैहरबा
हिन्दी प्राध्यापक
मो.नं.-9466220145

Tuesday, May 12, 2020

WHEN 1ST TIME HOUSE CONNECTED WITH ELECTRICITY?

आखिर हम न्यायपूर्ण व संवेदनशील व्यवस्था क्यों नहीं बना पाए?

अरुण कुमार कैहरबा

तय हुआ था वंचना कोई ना होगी और ना होगा कोई भूखा, बुनियादी सुविधाएं होंगी सबके आंगन में, और खुशियां ही खुशियां सबके जीवन में। पर दुखद है कि आज तक वह सपना पूरा नहीं हो पाया है। आज भी कितने ही लोगों का जीवन अभावों और संकटों में घिरा हुआ है। कोरोना वायरस की आपदा में लगे लॉकडाउन ने गरीब लोगों का काम छीन लिया है और जीवन में अप्रत्याशित संकटों को न्योता दिया है। 
DAINIK SWADESH FROM BHOPAL
12-5-2020

आज इस लेख में हम आपको एक ही घर में रह रहे दो परिवारों की व्यथा-कथा सुना रहे हैं। हरियाणा के करनाल जिला के गांव कलरी खालसा में रहने वाले परिवारों में कुल मिलाकर 12 सदस्य हैं। इन सदस्यों में जहां एक 75वर्षीय वृद्धा है, वहीं एक नन्हा बच्चा भी है। परिवारों के दोनों मुखिया व नन्हें बच्चे को छोड़ कर बाकी 9 सदस्य लड़कियां व महिलाएं हैं। इनमें से एक परिवार के चार सदस्य कुछ समय से शहर में रह रहे थे। परिवार का मुखिया कढ़ी-चावल की रेहड़ी लगाता था। लेकिन लॉकडाउन के दौरान जब धंधा पूरी तरह से चौपट हो गया तो सभी का पेट भरने के लिए शहर से अपने गांव में आना पड़ा। बाकी आठ सदस्य-75 साला बुजुर्ग मां कलावंती, मुखिया मदन पाल, पत्नी पालो, पांच बेटियां-दसवीं, आठवीं और छठी में एक-एक और नौवीं में पढऩे वाली दो बेटियां। 
घर में ना तो बिजली का कनैक्शन है और ना ही शौचालय। इन दोनों बुनियादी सुविधाओं के अभाव में घर में ही नहीं जीवन में भी अंधेरा है। खुले में शौच जाने की मजबूरी के कारण महिलाओं व बच्चियों को कितनी मुश्किलों व अपमान का सामना करना पड़ता होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कहां गई गांव की बेटी-सबकी बेटी की संस्कृति? परिवार का मुखिया मदन टीबी की बिमारी का मरीज है। दुखद यह है कि इस परिवार का राशन कार्ड गरीबी रेखा से नीचे वाला नहीं है। गरीबी रेखा से ऊपर वाला राशन कार्ड है। जिससे परिवार सरकार की गरीब लोगों के लिए सस्ते राशन की योजना का भी लाभ नहीं ले पाता।
DAINIK HARIBHOOMI 13-5-2020

आजकल तो स्कूल बंद हैं। लेकिन स्कूल के दिनों में इस परिवार की छात्राओं से अध्यापक होमवर्क पूरा नहीं करके आने व नहा कर नहीं आने की शिकायत करते तो छात्राएं निरूत्तर हो जाती। अब मैडम व सर को क्या बताएं कि वे क्यों नहा कर स्कूल नहीं आ पाती हैं। आखिर कहां नहाएं? कहां तैयार हों? वे मन ही मन सोचती- बन ठन कर स्कूल आने वाली मैडम व सर को क्या मालूम कि वे कैसे पढ़ रही हैं। स्कूल से जाने के बाद घर पर कितने ही काम होते हैं। रात को अंधेरे में पढऩा भी मुश्किल होता है। परिवार की बच्चियां अपने जीवन की सारी व्यथा को बता नहीं पाती। आए दिन की इस पूछताछ को देख रहे एक मास्टर साहब को लगता है कि निरे उपदेश देने से कुछ नहीं होगा। परिवार की स्थितियों को जानने के लिए घर जाना चाहिए। वे घर जाते हैं तो सारी सच्चाई सामने आ जाती है। सामने यह भी आता है कि एक ही गांव में रहने वाले लोग अपने ही आस-पास रहने वाले लोगों के जीवन के प्रति उदासीन बने हुए हैं। परस्पर सहयोग करने की भावना खत्म होते जाने के कारण गांव में भी लोग अपने तक ही महदूद होकर रह गए हैं। किसी के घर में बिजली ही नहीं भोजन भी है या नहीं, किसी दूसरे को कुछ फर्क नहीं पड़ता है। कुछ परिवारों की भयानक आर्थिक स्थिति के बावजूद लोग बेअसर और संवेदनशून्य हैं। क्या इसी लिए गांव बसाए गए थे? क्या इसीलिए पंचायतों का चुनाव होता है? खैर, मास्टर जी मन ही मन परिवार के लिए सहयोग जुटाने की ठान लेते हैं।
DAINIK JAMMU PARIVARTAN
12-5-2020

अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के अहसास से लबरेज मास्टर जी कुछ अधिकारियों के सामने परिवार की दशा का जिक्र करते हैं तो एक अधिकारी जेब से रूपये निकाल कर महिन्द्र मास्टर जी को ही बिजली का कनैक्शन लगवाने की जिम्मेदारी दे देते हैं। कुछ और साथी भी सहयोग करते हैं। मास्टर जी के आग्रह पर बिजली विभाग तत्परता के साथ बिजली चालू कर देता है। सालों बाद बिजली का बल्ब जलने पर परिवार में खुशी का माहौल था। रात को खाना खाने के बाद सारा परिवार बल्ब की रोशनी में नीचे पल्लड़ बिछा कर बैठा है। दादी और बच्चियां मिलकर ताली बजाते हुए गीत गा रहे हैं। 

मास्टर जी अपनी छात्राओं के घर में शौचालय निर्माण की तैयारियों में लग गए हैं। यह एक परिवार के लिए तो खुशी का कारण बना है। लेकिन देश में ऐसे तो कितने ही परिवार हैं, जहां पर सुविधाओं का अभाव है। ऐसे एक मास्टर जी ही नहीं अनेक चाहिएं। मास्टर जी ही क्यों? पूरा समाज आपसी सहयोग से समस्याओं का समाधान करने वाला क्यों नहीं बनता? सरकारें, प्रशासनिक इदारे, पंचायती राज संस्थाएं क्यों ऐसे लोगों की पहचान करके उन तक सुविधाएं नहीं पहुंचा पाती? या जानबूझ कर अपने-अपनों को लाभ पहुंचाना और अपना भरने के लिए कोई भी तरीका अपनाना, लेकिन जरूरतमंद को नजंदराज करते रहना। ऐसी भेदभावकारी नजर और नीति हमारे समाज का भला नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में आम गरीब लोगों पर लॉकडाउन में क्या बन रही होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। पहली बार घर में बिजली के बल्ब जलने की खुशी को आपने भी वर्षों पहले महसूस किया था। आज भी बहुत से लोग इस खुशी से वंचित हैं। आईये, सहयोग का हाथ बढ़ाएं। 
ARTH PARKASH 13-5-2020

अरुण कुमार कैहरबा
हिन्दी प्राध्यापक
वार्ड नं.-4, रामलीला मैदान,
इन्द्री, जिला-करनाल, हरियाणा
मो.नं.-9466220145

Wednesday, May 6, 2020

ARTICLE ON GURUDEV RABINDERNATH TEGORE JAYANTI

विलक्षण प्रतिभा से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत की बढ़ाई शान

अरुण कुमार कैहरबा 

किसी भी देश की वास्तविक पूंजी उसके नागरिकों में ही छिपी होती है। इसीलिए मानव संसाधन के विकास पर अधिक बल दिया जाता है। लोगों की प्रतिभा और मेहनत से देश की शान भी बढ़ती है। यही नहीं कुछ लोग तो अपनी प्रतिभा के बल पर किसी देश व समाज की पहचान तक बन जाते हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर भी ऐसी ही शख्सियत हैं, जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक पहचान को चार चांद लगाए। उन्होंने अपनी प्रतिभा, मानवतावादी विचारों, कार्यों व लेखनी के माध्यम से दर्शन, साहित्य, संगीत, चित्रकला, शिक्षा सहित विभिन्न
क्षेत्रों को नई देन दी, जिसे सदा याद रखा जाएगा। अंग्रेजी शासन की नृशंस कार्रवाईयों को देखते हुए उन्होंने उनकी सर व नाइटहुड आदि की उपाधियों को लौटा दिया। उनके योगदान को देखते हुए देश की जनता ने उन्हें सम्मान स्वरूप गुरुदेव की उपाधि दी।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के कार्य देश की सीमा से निकल कर दुनिया भर में चमके। 1913 में उनके गीत संग्रह-गीतांजलि के लिए उन्हें नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह केवल भारत का ही नहीं बल्कि साहित्य के क्षेत्र में एशिया महाद्वीप का पहला नोबेल पुरस्कार था। वे दुनिया के पहले ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनके लिखे गए गीत दुनिया के दो देशों के राष्ट्रगान के रूप में विभूषित हुए। उनका लिखा गया-जन गण मन अधिनायक जय हे भारत का राष्ट्रगान है तो उन्हीं की रचना-आमार सोनार बांगला बांग्लादेश का राष्ट्रगान है। अपने जीवनकाल में उन्होंने देश-दुनिया के विभिन्न स्थानों की यात्राएं की और अनेक महान शख्सियतों के साथ मुलाकातें की। 

रवीन्द्रनाथ का जन्म 7मई, 1861 को कलकत्ता में देवेन्द्रनाथ ठाकुर व शारदा की चौदहवीं संतान के रूप में हुआ था। पिता ब्रह्म समाज से जुड़े थे। परिवार समृद्ध व सम्पन्न था। मां की तबियत ठीक नहीं रहती थी। बच्चों की देखरेख व खान-पान का जिम्मा नौकरों के हाथ में था। बच्चों की सक्रियता पर लगाम लगाने के लिए एक बार एक नौकर ने रामायण का लक्ष्मण रेखा प्रसंग सुनाया और लक्ष्मण रेखा लांघने पर मुसीबत में पड़ जाने का उपदेश दिया। बालक रबीन्द्रनाथ की पढ़ाई के लिए घर पर ही शिक्षक आते थे। अपने बड़े भाईयों की तरह उनका मन भी स्कूल जाने के लिए मचलता था। बताते हैं कि जब उन्होंने स्कूल जाने की इच्छा व्यक्त की तो अध्यापक ने उनकी पिटाई कर दी। बाद में उन्हें स्कूल में भेजा जाने लगा, लेकिन अध्यापकों की क्रूरता और मार-पिटाई से रवीन्द्रनाथ ठाकुर का मन शिक्षा से विचलित रहने लगा। उनके मन में सवाल पैदा हुआ कि जिन स्कूलों को विद्या मंदिर कहा जाता है, उनमें हिंसा आखिर क्यों होती है।
स्कूली शिक्षा से ऊबे बालक रबीन्द्रनाथ ने अपने पिता के साथ हिमालय की यात्रा की। शांतिनिकेतन से वे अमृतसर पहुंचे। यहां से सात हजार फीट की ऊंचाई पर डलहौजी पहुंचे। हिमालय की आगोश में उन्होंने चार महीने बिताए, जिसका उनकी सोच व संस्कारों पर गहरा प्रभाव पड़ा। घर लौटने पर वे परिजनों व आसपास के बच्चों को हिमालय के किस्से सुनाते।  
12 साल की उम्र में रबीन्द्रनाथ टैगोर ने अभिलाषा कविता लिखी, जोकि तत्वबोधिनी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। रबीन्द्र की उम्र 13 साल की ही थी कि मां का देहांत हो गया और रबीन्द्र फिर से हिमालय जाने की सोचने लगे। ऐसे में बड़े भाई ज्योतिन्द्रनाथ और उनकी पत्नी कादंबरी देवी ने बड़ा सहारा दिया। सदमे से उबरने पर 14 वर्ष के रबीन्द्र ने 1600 शब्दों की कविता-वनफूल लिखी, जोकि ज्ञानांकुर पत्रिका में प्रकाशित हुई। 
रबीन्द्रनाथ के पिता उन्हें बैरिस्टर बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने 1878 में रबीन्द्रनाथ को ब्रिटेन भेज दिया। वहां पर उन्हें पश्चिमी संगीत व नृत्य आदि कलाएं सीखने का मौका मिला। बाद में पढ़ाई बीच में छोड़ कर वे भारत आ गए। यहां वापिस लौटे तो घर में ना भाई-भाभी थे और ना पिता जी। अत: अकेलेपन में उन्होंने उदास गीतों की रचना की, जोकि उनके सांध्यगीत संग्रह में प्रकाशित हुए। इस दौरान उन्होंने दो नाटक भी लिखे। उनका विवाह 11वर्ष की मृणालिनी से कर दिया गया। पोस्टमास्टर, चित्रा, नदी, चैताली, विदाई अभिशाप, चिरकुमार सभा व काबुलीवाला सहित अनेक रचनाएं आई। उनकी काबुलीवाला पर तो हेमेन गुप्ता के निर्देशन में फिल्म भी बनी है, जिसमें बलराज साहनी ने मुख्य भूमिका निभाई। उनका बच्चों के लिए लिखा गया- शारदोत्सव नाटक बंगाल में बहुत प्रसिद्ध है। उनके उपन्यास नष्टनीड़ पर चारूलता फिल्म बनी। उनकी अनेक रचनाओं को आधार बनाकर फिल्मकारों ने फिल्मों का निर्माण किया। 
रबीन्द्रनाथ ठाकुर अराजनैतिक व्यकितत्व थे, जिनका दुनिया के अनेक शासकों ने स्वागत किया। भारत में हो रहे राजनैतिक बदलावों पर उन्होंने अपनी प्रतिक्रियाएं जताई। 1905 में बंगाल विभाजन का उन्होंने जोरदार विरोध किया। अनेक सभाओं का संबोधित किया। 1919 में जलियांवाला बाग के हत्याकांड ने रबीन्द्रनाथ को झकझोर दिया। उन्होंने नाइटहुड की उपाधि लौटाते हुए अंग्रेज वायसराय को पत्र लिखा। हत्याकांड के सबसे बड़े किरदार को अंग्रेजी संसद द्वारा माफ किए जाने पर उन्होंने रोष जताया। टैगोर और महात्मा गान्धी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे। टैगोर ने गान्धीजी को महात्मा का विशेषण दिया था। एक समय था जब शान्तिनिकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे। उस समय गान्धी जी के आह्वान पर टैगोर को 60 हजार रुपये के अनुदान का चैक दिया गया था।
शिक्षा की दृष्टि से रबीन्द्रनाथ के मन में बड़ी बेचैनी थी। 22 दिसंबर1901 में उन्होंने शांति निकेतन में उन्होंने आश्रम शुरू कर दिया। पांच बच्चों और इतने ही अध्यापकों के साथ स्कूल की स्थापना हुई थी। गुरुदेव प्रकृति को सर्वश्रेष्ठ शिक्षक मानते थे। यही कारण है कि आश्रम में पेड़ों के नीचे कक्षाएं लगती थी। रबीन्द्रनाथ ने बच्चों के लिए प्रार्थना लिखी थी। उनका मानना था कि अध्यापक दीपक की तरह होता है, उसके ज्ञान से बच्चे सीखते हैं। आश्रम को चलाने के लिए पत्नी मृणालिनी ने शादी के जेवर व सोने की घड़ी तथा अपने लिए बनवाया गया घर तक बेच दिए। आश्रम का खर्च चलाने के लिए कर्ज भी लेना पड़ा। कोलकाता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। गुजरात के आया प्रतिनिधिमंडल शांति निकेतन में पहुंच गया और आर्थिक सहयोग का आश्वासन दिया। योग, कसरत, खेल, बागवानी, बंगाली, अंग्रेजी, इतिहास, गणित, विज्ञान, चित्रकला, संगीत, नृत्य आदि विषय थे। 1921 आते-आते विद्यालय का नाम विश्व भारती हो गया। विश्व भारती विश्वविद्यालय देश में शिक्षा का ऐसा केन्द्र है, जहां पर दुनिया भर के विभिन्न देशों के विद्यार्थी पढऩे के लिए आते हैं। भारतीय संस्कृति व कला के साथ ही दुनिया की विभिन्न भाषाओं की यहां पर शिक्षा दी जाती है। हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस संस्थान में कईं वर्षों तक हिन्दी शिक्षण किया। उन्होंने अपने संस्मरणों में भी गुरुदेव की संवेदनशीलता व प्रकृति प्रेम को उजागर किया है। एक कुत्ता और एक मैना नामक रचना में द्विवेदी जी बेजुबान पशु-पक्षियों के प्रति गुरुदेव के स्नेह को प्रकट करते हैं।
गुरुदेव का बनावटी और दिखावटी शिक्षा के प्रति आक्रोश उनकी कहानी-तोता में बड़े तीखेपन के साथ प्रकट होता है। जिस तोते को पढ़ाने का जिम्मा राजा के द्वारा दिया जाता है, सारी व्यवस्था उस तोते को नजरंदाज करते हुए भी आत्ममुग्ध होती है। सारे उपक्रमों और क्रियाओं के बीच ही तोता मर जाता है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का शिक्षा-दर्शन उस बच्चे को खेल, रचनात्मक क्रियाओं के द्वारा प्राकृतिक माहौल में शिक्षा प्रदान करने की पक्षधरता करता है। रवीन्द्रनाथ अपने जीवन के आखिरी वर्षों में चित्रकारी को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने वाली विरली शख्सियत हैं। वे तीन हजार के करीब  पेंटिंग बनाते हैं और चित्रकला में अपना अन्यतम स्थान बनाते हैं। संगीत के क्षेत्र में उनके नाम से रवीन्द्र की एक धारा चल पड़ती है। उनका संगीत जहां एक ओर प्रकृति के साथ जुड़ा है, वहीं उसमें पाश्चात्यत संगीत के तत्व भी देखे जा सकते हैं। 
संक्षेप में कहें तो रवीन्द्रनाथ टैगोर का व्यक्तित्व इतना विराट था कि किसी एक रचना से उसे समझा नहीं जा सकता। उनकी कविताएं, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटकों ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बनाई तो संगीत, नृत्य, नाट्य व चित्रकला के क्षेत्रों को भी देन दी। अपने शिक्षा संस्थान को चलाने के लिए उन्होंने देश भर में जा-जाकर नाटक खेले। सात अगस्त, 1941 को उनका निधन हो गया, लेकिन अपने काम व रचनाओं के जरिये वे सदा भारत की शान व पहचान बने रहेंगे।

Thursday, April 30, 2020

अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस (1मई) पर विशेष लेख (INTERNATIONAL LABOUR DAY)

मजदूरों की दशा सुधारने पर हो सरकार का ध्यान

अरुण कुमार कैहरबा

मजदूर किसी भी देश व समाज की व्यवस्था की रीढ़ हैं। मजदूरों की मेहनत से ही दुनिया विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रही है। लेकिन कमेरे वर्ग की मेहनत का पूरा फल उसे नहीं मिलता। या यूं कहें कि कमेरा वर्ग काम करता है और लुटेरा वर्ग उसकी मेहनत पर मौज करता है। यही कारण है कि दुनिया के मु_ी भर लोगों के पास धन-दौलत का बड़ा हिस्सा सिमट गया है और मजदूरों की बड़ी आबादी बुरी हालत में रहने को मजबूर है। कोरोना वायरस से बचने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौरान मजदूरों की असुरक्षा और अपने घर पहुंचने के लिए उनका सडक़ों पर पैदल चल पडऩे का हृदयविदारक दृश्य मजदूरों की दयनीय दशा को उजागर करता है। अपने जिन घरों के लिए मजदूर बड़े महानगरों व नगरों से निकल पड़े, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है वहां उनका घर है भी या नहीं। वरना सपनों के शहर से निकलना किसे अच्छा लगता।
PRAKHAR VIKAS -5-2020
हर प्रकार का शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक श्रम करके मेहनताना पाने वाले व्यक्ति को मजदूर कहते हैं। इसमें फैक्ट्रियों, खेत-खलिहानों, सडक़ों, पुलों, भवनों आदि के निर्माण के लिए हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले श्रमिक भी शामिल हैं। ऑफिसों में फाईलें उठाने वाले, पत्र-पत्रिकाओं में कलम चलाने वाले, प्रयोगशालाओं, स्कूलों-अस्पतालों सहित विभिन्न स्थानों में सफेद कॉलर जॉब करके विविध प्रकार की सेवाएं देने वाले लोग भी शामिल हैं। इनमें कुशल व अकुशल तथा संगठित व असंगठित हर प्रकार के श्रमिक हैं। इनमें मासिक वेतन, मानदेय प्राप्त करने वाले भी हैं और हर रोज काम करने वाले दिहाड़ीदार भी हैं। इनमें नियमित कर्मचारी भी हैं और ठेके, अनुबंध, डेलीवेज सहित विभिन्न प्रकार की संज्ञाओं से अभिहित किए गए लोग हैं। 
बेरोजगारी का आलम यह है कि हर छोटे-बड़े शहर में अनाज मंडी व सब्जी मंडी की तरह मजदूरों की मंडियां लगने लगी हैं, जहां पर आस-पास के गांवों से काम की तलाश में मजदूर आ जाते हैं। जिन लोगों को मजदूर की जरूरत होती है, वे मंडी से मोल-भाव करके मजदूरों को ले जाते हैं। कितने ही मजदूर सारा दिन काम के लिए जाने का इंतजार करके वापिस चले जाते हैं। बिना कमाई के घर पहुंचने पर बच्चों व परिजनों के सामने उनकी क्या दशा होती होगी, इसे वे ही जानते हैं। हमारे देश में लोखों श्रमिक ऐसे हैं, जो काम की तलाश में अपने गांव की डगर छोड़ कर शहरों में आते हैं। वे मलिन बस्तियों में अस्वस्थ माहौल में झोंपडिय़ों में रहते हैं और किसी फैक्ट्री में काम की तलाश करते हैं। काम मिल जाने पर वे अपने पूरे परिवार को वहीं ले जाते हैं। अपना घर बनाने, बच्चों को पढ़ाने और जीवन-स्तर ऊंचा उठाने का सपना लेकर वे शहरों का रूख करते हैं। कठिन परिश्रम करने के बावजूद कितने लोगों का यह सपना पूरा होता है और कितने लोग उन सपनों को अपनी आंखों में लिए ही मेहनत में जुटे रहते हैं। मजदूरों की बड़ी आबादी काम के सीजन में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जाती है।
लॉकडाउन के दौरान शहरों में विभिन्न प्रकार के काम कर रहे मजदूरों की दशा सडक़ों पर देखने को मिली। जब फैक्ट्रियों के मालिकों ने उन्हें काम से निकाल दिया। काम धंधे ठप्प होने के कारण खाने को कुछ ना बचा। या फिर रोटी को लेकर असुरक्षित महसूस करते हुए, वे अपने सपनों के शहर से निकल कर बच्चों को गोद और सामान की पोटली को सिर पर उठाए पैदल अपने ठिकानों के लिए निकल पड़े। सपरिवार सैंकड़ों किलोमीटर की यात्रा के लिए निकले श्रमिक परिवारों के लिए यह कोई साहसिक खेल नहीं था, बल्कि जीवन को लेकर असुरक्षा का माहौल था। जो कोरोना वायरस हवाई जहाजों में शान की सवारी करते हुए देश में आया, उसकी गाज भी आम आदमी पर ही गिरी।
लॉकडाउन के 40 दिन में देश व प्रदेश की सरकारें गहरे आर्थिक-संकट की ओर इशारा कर रही हैं। ऐसे में उन मजदूरों की दशा की कल्पना वे सरकारें भी नहीं कर सकी, जो मजदूर हर रोज कमा कर खाते थे और कईं दिन से बेकार हैं। उन मजदूरों को राहत और पूरी सुरक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी निभाने की बजाय सरकारें पूंजीपतियों को राहत देने के प्रति ज्यादा सजग दिखाई देती हैं। जिन सरकारों को लोग इस उम्मीद से चुनते हैं कि वे हमारे हितों की रक्षा करेंगी, वे सरकारें अपने कर्मचारियों के महंगाई भत्ते, एलटीसी सहित विभिन्न प्रकार की सुविधाओं पर कटौती करके आर्थिक बचत करती हैं।
कोरोना संकट का बहाना बनाकर मजदूरों-कर्मचारियों के भत्तों पर कैंची चलाना दरअसल सरकारों की उन नीतियों का ही एक हिस्सा है, जिसमें खर्च कम करने के लिए वे स्थाई रोजगार देने की जिम्मेदारी से बचती हैं। इसके लिए निजीकरण, उदारीकरण व वैश्वीकरण सहित अनेक प्रकार के लोकलुभावन दिखाई देने वाली नीतियां हैं। बड़े-बड़े सरकारी इदारों को चलाने-बचाने की बजाय विनिवेश का नाम लेकर बेच दिया जाता है। क्या जनता इसीलिए सरकारों का चुनाव करती है कि वे जनता के हितों को तिलांजलि देकर पूंजीवादी नीतियां बनाएं। 
दुनिया भर में मनाया जाने वाला मजदूर दिवस शिक्षा, संगठन व संघर्षों का गवाह है। 1 मई, 1886 को अमेरिका के हजारों कारखानों के लाखों मजदूरों ने काम के आठ घंटों के लिए हड़ताल की थी। तब कारखानों के मालिकों ने हर प्रकार की ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन पर हमला किया था। आज काम के आठ घंटे का अधिकार कानूनन मिल चुका है। लेकिन क्या वास्तव में आज भी ऐसा हो पाया है। आज भी फैक्ट्रियों में मजदूरों को बहुत कम वेतन पाने के लिए 12-12 घंटे काम करना पड़ता है। कारखानों ही में नहीं निजी क्षेत्र के शिक्षा संस्थानों तक में काम के बदले जिस वेतन पर कर्मचारी हस्ताक्षर करते हैं, उससे कहीं कम पाते हैं। इसके अलावा भी आज मजदूरों के समक्ष अनेक प्रकार की चुनौतियां हैं। हर प्रकार के मजदूरों की एकता और संघर्ष के रास्ते में शारीरिक व बौद्धिक श्रम के स्तर में अंतर, जाति, धर्म, संप्रदाय सहित अनेक प्रकार की अड़चनें हैं। मजदूरों को विभिन्न वर्गों, जाति, धर्म के नाम पर बांटने की राजनीति होती है और उनके मूल मुद्दों से ध्यान भटका दिया जाता है। आज रोजगार, घर, भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य के सबके अधिकार के लिए सरकारों को काम करना चाहिए। हर हाथ को काम और पूरा मेहनताना व सम्मान दिए बिना कोई देश तरक्की नहीं कर सकता। कारखानों में काम करने के लिए अंधेरी कोठरियों में कईं-कईं व्यक्तियों के रहने की मजबूरी, मलिन बस्तियों की हालत सुधारने और बेरोजगारी दूर करने के लिए ठोस नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने की जरूरत है। हर प्रकार काम के लिए ठेका प्रथा को बढ़ावा दिया जाना किसी भी तरह से उचित नहीं है। युवाओं को स्थाई रोजगार प्रदान करना नीति का हिस्सा होना चाहिए। और हां, अनाज के भरे गोदामों के देश में लॉकडाउन के दौरान घरों में सिमटे, घरों से दूर क्वारंटाइन किए गए मजदूरों के परिवार भूख से ना मरें, इसके लिए पर्याप्त प्रबंध किए जाने की जरूरत है। 

अरुण कुमार कैहरबा,
हिन्दी प्राध्यापक
संपर्क नं.-9466220145

Wednesday, April 29, 2020

इरफान खान: शानदार अभिनेता व बेहतरीन इन्सान

इरफान खान: शानदार अभिनेता व बेहतरीन इन्सान

अरुण कुमार कैहरबा 

बुधवार को बेहद दुखद खबर मिली। एक शानदार अभिनेता और बेहतरीन इन्सान इरफान खान की मौत की खबर ने रंगकर्मियों व फिल्मी जगत को हिलाकर रख दिया। इरफान खान भारत के ऐसे विरले अभिनेताओं में हैं, जिन्होंने बॉलीवुड ही नहीं हॉलीवुड में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उसकी आवाज़ और अंदाज़ तो आकर्षक थे ही उसकी आंखें भी बहुत कुछ बोलती थी। संघर्षों में पले-बढ़े अभिनेता की असामयिक मौत ने बहुत से लोगों को गहरे शोक में डुबो दिया है।

इरफान का जन्म 7 जनवरी, 1967 को राजस्थान के जयपुर में हुआ। उनके पिता टायर का कारोबार चलाते थे। इरफान पहले क्रिकेटर बनना चाहते थे। जब वे एमए कर रहे थे, तो थियेटर के प्रसिद्ध संस्थान नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में उनका दाखिला हो गया। इरफान खान का शुरुआती दौर संघर्ष से भरा था। जब उनका एनएसडी में प्रवेश हुआ, उन्हीं दिनों उनके पिता की मृत्यु हो गई। घर के आय का स्रोत ही समाप्त हो गया। एनएसडी में सुतापा सिकदर के साथ उनकी दोस्ती प्यार में बदल गई, जिनसे बाद में उन्होंने शादी की। एनएसडी से अभिनय की पढ़ाई पूरी करने के बाद इरफान मुंबई चले गए। शुरूआत में फिल्मों की बजाय उन्हें टीवी सीरियलों में छोटे-मोटे किरदार करने को मिले। इन भूमिकाओं को उन्होंने आगे बढऩे की सीढ़ी के रूप में लिया। चाणक्य, चंद्रकांता, स्टार बेस्ट सेलर्स जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों में इरफ़ान ख़ान के बेहतरीन अभिनय ने फिल्म निर्माता-निर्देशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

मीरा नायर की फिल्म सलाम बांबे में उन्हें मेहमान भूमिका निभाने का अवसर मिला। सलाम बांबे के बाद इरफ़ान ख़ान लगातार ऑफबीट फिल्मों में अभिनय करते रहे। एक डॉक्टर की मौत, कमला की मौत और प्रथा जैसी समांतर फिल्मों में अभिनय के बाद इरफ़ान ख़ान ने मुख्य धारा की फिल्मों की ओर रूख किया। हासिल में रणविजय सिंह की नकारात्मक भूमिका में इरफ़ान ख़ान ने अपनी अभिनय-क्षमता का लोहा मनवाया। देखते-ही-देखते वे मुख्य धारा के निर्माता-निर्देशकों की पसंद बन गए। उसके बाद इरफान ने लंचबॉक्स, गुंडे, हैदर, पीकू और जुरासिक वल्र्ड में भी काम किया। इरफान खान को फिल्म पान सिंह तोमर के लिए नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया और साथ ही उन्हें वर्ष 2011 में भारत सरकार की तरफ से पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

इर$फान मौजूदा दौर के उन अभिनेताओं में हैं, जो अपने आप को फिल्मों में नायक की भूमिका के दायरे तक महदूद नहीं रखते। वे यदि लाइफ इन ए मेट्रो, आजा नचले, क्रेजी-4 और सनडे जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण चरित्र भूमिकाएं निभाते हैं, तो मकबूल, रोग और बिल्लू में केंद्रीय भूमिका भी निभाते हैं। गंभीर अभिनेता की छवि वाले इरफ़ान ख़ान समय-समय पर हास्य-रस से भरपूर भूमिकाओं में भी दर्शकों के सामने आते हैं। इनके अभिनय का जादू केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों पर छाया हुआ है। उन्होंने हॉलीवुड की सच अ लॉन्ग जर्नी(1988), द नेमसेक (2006), ए माइटी हार्ट (2007), दार्जीलिंग लिमिटेड (2007), स्लमडॉग मिलियनेयर (2008), लाइफ ऑफ पाई (2012), द अमेजिंग स्पाइडर मैन (2012), जुरासिक वल्र्ड (2015) व इन्फर्नो (2016) में काम किया है। 

उनके अभिनय का सफर नई बुलंदियों की ओर बढऩा था। लेकिन 2018 में उन्हें पता चला कि उन्हें न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर है, जोकि एक किस्म का कैंसर है। इसके इलाज के लिए वे एक साल तक ब्रिटेन में रहे। कुछ दिन पहले उनकी माता का निधन हो गया था। कोरोना वायरस व लॉकडाउन के चलते वे अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए थे। और 29 अप्रैल को वे भी अपने सफर को पूरा करके चले गए। लोग उन्हें और उनके अभिनय को याद कर रहे हैं। रंगकर्मी नरेश प्रेरणा ने बताया कि ‘पहली बार उनको टीवी फिल्म में देखा था। फिल्म लेनिन के जीवन के बारे में थी-लाल घास पर नीले घोड़े। इरफान ने लेनिन की भूमिका अदा की थी। कमाल ये था कि लेनिन का गेटअप नहीं था फिर भी बेहतरीन ढ़ंग से लेनिन को देखते रह गया था। उनकी आवाज़ और अंदाज़ लोगों को अपने करीब ले जाते थे। वो हीरो नहीं थे लेकिन तमाम हीरो उनके सामने पानी भरते थे। वे स्टार का मायाजाल नहीं बुनते थे बल्कि एक आम इन्सान की संभावनाओं को खोजते हुए किरदार को बुनते थे। विश्व सिनेमा उनका मंच बन गया था। अभी तो उनको बहुत कुछ करना था।’ एनएसडी पासआउट स्नेहा कुमार, गोगे बाम व नरेश नारायण ने इरफान की असामयिक मौत पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि बड़े स्टार बनने के बाद भी उनमें लेश मात्र भी अहम नहीं था। वे कलाकारों को आगे बढ़ाते थे और प्रेरणा देते थे। रंगकर्मी कृष्ण नाटक ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- ‘मैं इरफान हूँ, अंग्रेजी मीडियम का लाजवाब इंसान हूँ, लंचबॉक्स में प्यार का अहसास हूँ, हैदर में रूह का आभास हूँ, स्लमडाग मैलेनियर का चेहरा ए खास हूँ, करामाती कोट में बच्चों की भी आस हूँ, आन हूँ, इरफान हूँ, इसीलिए तेरे जाने से में भी कितना परेशान हूँ।’

Thursday, April 23, 2020

अंधकार में सूरज बन कर सबको दे उजियारा पुस्तक

विश्व पुस्तक दिवस (23 अपै्रल) पर विशेष

अच्छी किताबों और अध्ययन संस्कृति के विकास की उपेक्षा क्यों?

अरुण कुमार कैहरबा
AJIT SAMACHAR 23-04-2020

अंधकार में सूरज बन कर सबको दे उजियारा पुस्तकजब भी भटकें सही दिशा से बने भोर का तारा पुस्तक।
किसी कवि की ये पंक्तियां हमारे जीवन में किताबों की अहमियत को बयां करती हैं। किताबें केवल समय काटने का साधन ही नहीं हैं, बल्कि एक बेहतर सहयोगी, सद्भावनापूर्ण, तर्कशील, विचारशील व ज्ञान आधारित नागरिक समाज के निर्माण में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। बढ़ती मारधाड़ व आपाधापी का इलाज अध्ययन संस्कृति के जरिये हो सकता है। क्योंकि किताबें मनुष्य की पाशविकता को सोखकर संवेदनशील बनाती हैं। शिक्षा भी यही काम करती है। शिक्षा किताबों के संसार से हमारा परिचय कराती है। किताबें हमारी जिज्ञासाओं को शांत करती हैं। हमारी मानसिक व बौद्धिक जरूरतें पूरी करने में इनकी अहम भूमिका है। ये हमें सपना देखना सिखाती हैं। इन सपनों को साकार करने का रास्ता भी दिखाती हैं। किताबें हमें प्रश्र पूछना सिखाती हैं। ये हमें आत्मविश्वास देती हैं। इनके जरिये ही बच्चे व युवा जीवन की ऊंचाईयां हासिल करते हैं। 
शैक्षिक संस्थानों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे विद्यार्थियों को बेहतर किताबें उपलब्ध करवाएंगी। पढऩे-पढ़ाने की संस्कृति का विकास करेंगी। लेकिन बदकिस्मती है कि ऐसा हो नहीं रहा। बेहतर नागरिक बनने-बनाने की बजाय यहां पर किताबें पढऩे-पढ़ाने का मकसद परीक्षा की वैतरणी को पार करना हो गया है। उद्देश्य की यह संकीर्णता यहीं तक सीमित नहीं रहती, आगे बढ़ते हुए यह संकीर्णता कुंजियों के अध्ययन-अध्यापन और रट्टापद्धति में सिमट गई है। अध्यापकों और सुविधाओं की कमी के चलते भी उद्देश्य व्यापक होने की बजाय संकीर्ण होते गए हैं और शिक्षा विद्यार्थियों की सृजनशीलता को पल्लवित-पुष्पित करने की बजाय उसे कुंद करने पर तुल गई है। 
बच्चों को तो छोड़ ही दें, अध्यापकों में भी पढऩे की संस्कृति का अभाव है। अधिकतर अध्यापक प्राय: पढ़ाए जाने वाली विषय-वस्तु का कामचलाऊ ज्ञान रखते हैं और लिपिकीय कार्य की भांति ही अपने शिक्षण कार्य को भी अंजाम देते हैं। यही कारण है कि स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। अधिकतर सरकारी स्कूलों में पुस्तकालयों का प्रावधान होता है। प्राथमिक पाठशालाओं में भी पुस्तकालय के नाम पर किताबें तो होती ही हैं। लेकिन अध्यापक उन्हें अक्सर संदूक या पेटी में भरे रखते हैं। खुद ही किताबों को पढऩे में रूचि नहीं रखने के कारण उन्हें किताबों को संदूकची की कैद से मुक्त करवाने में भी दिलचस्पी नहीं रहती है। किताबें खुद ही जब कैद हो जाएंगी तो वे मुक्ति का माध्यम कैसे बनेंगी? उच्च एवं वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों में पुस्तकालय को विद्यार्थियों की जरूरतों के अनुसार सम्पन्न बनाने के लिए हर वर्ष अनुदान दिया जाता है। लेकिन जरूरतों की बजाय पुस्तकालयों में लुगदी साहित्य का ढ़ेर लगता जाता है। जैसे हर स्थान पर बाजार ने घुसपैठ की है, उसी प्रकार किताबों का भी एक भरापूरा बाजार है। लुगदी साहित्य मतलब जिसकी उपयोगिता शिक्षा कर्म में लोगों को ना हो, बल्कि बाजार के लाभ के लिए हो। ऐसे साहित्य का बाजार स्कूलों को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देता है और अपना वर्चस्व बनाए रखता है। मुनाफे के लालच में कुंजीनुमा किताबों के प्रकाशक स्कूलों में पहुंचते हैं। स्कूलों को कमीशन देते हैं और अपनी किताबें डाल कर चलते बनते हैं। ऐसे में बच्चों के सर्वांगीण विकास और अध्ययन संस्कृति के विकास के प्रति तो उदासीनता स्पष्ट हो जाती है। स्कूलों में पुस्तकालय सबसे कम महत्व का स्थान है। निजी स्कूलों की स्थिति इससे भी अधिक चिंताजनक है। अधिकतर स्कूलों में तो पुस्तकालय देखने को भी नहीं मिलता। कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में भी पुस्तकालयों और किताबें पढऩे की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। खुद किताबें तलाशनें और पढऩे की प्रति कम ही विद्यार्थियों का रूझान होता है।
सरकारों द्वारा स्मार्ट सिटी और स्मार्ट विलेज की अवधारणाओं को जमकर उछाला जा रहा है। आदर्श गांव-शहर के विविध आयामों पर चर्चा भी होती है। इन्हें नेताओं द्वारा भी अपने भाषणों में मुद्दा बनाया जाता है। लेकिन पुस्तकालय व किताबें पढऩे की संस्कृति उनके भाषणों से नदारद रहती है। देश भर में विकास के नाम पर तरह-तरह के उपाय किए जा रहे हैं। सडक़ों का निर्माण, ग्राम सचिवालय, वाई-फाई की सुविधा, बड़े-बड़े भवन आदि बन रहे हैं। लेकिन कितने ही कस्बों और शहरों में पुस्तकालय बनाने की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। कईं बार तो ऐसा भी लगता है जैसे किताबों और किताबों से होने वाले सशक्तिकरण से हमारे राजनेता भय खाते हैं। इसीलिए तो बने-बनाए पुस्तकालयों को विकास की भेंट चढ़ा दिया जाता है। हरियाणा के करनाल में पाश पुस्तकालय को मेडिकल कॉलेज के नाम पर ध्वस्त कर दिया जाना इसी प्रकार का उदाहरण दिखाई देता है। 
गांवों में तो पुस्तकालय खोलने के बारे में सोचा भी नहीं जाता। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में कईं पंचायतें बहुत ही सम्पन्न हैं, जिनकी सालाना आमदनी करोड़ों-अरबों में है। वहां पर बड़े-बड़े बारात घर बन रहे हैं। पंचायतों और लोगों द्वारा बहुत ही महंगे आयोजन होते हैं। लेकिन पंचायतें गांव में एक अदद पुस्तकालय खोलने के बारे में नहीं सोचती हैं। लोग भी ना जाने कैसी चीजों में उलझ गए हैं कि मिलकर एक पुस्तकालय खोलने के बारे में नहीं सोचते। जहां से बच्चे व युवा ज्ञान व आनंद के लिए पढऩे का हुनर सीखें। मूल्यहीनता की स्थिति में इस सारे विकास को हम बेकार होते हुए देख रहे हैं, लेकिन मूल्यों व बेहतर संस्कारों के लिए स्थायी उपाय की तरफ नहीं सोच पा रहे हैं। आज स्मार्ट गांव व शहर बनाने के लिए अध्ययन संस्कृति के विकास और पुस्तकालय की अनिवार्यता के विचार को जोर-शोर से उठाए जाने की जरूरत है। समाज में भी किताबों की अहमियत को लेकर विचार-विमर्श का माहौल बनाए जाने की जरूरत है। अध्ययन संस्कृति और विचार-विमर्श की संस्कृति का गहरा संबंध है। किताबें हमारे बीच आएंगी। उन्हें पढ़ा जाएगा तो संवादहीनता और मुद्दाविहीन समाज में मुद्दे केन्द्र में आएंगे और उन पर चर्चा भी हो पाएगी। 21वीं सदी में विकास के दावों और अंधविश्वास, जात-पात, साम्प्रदायिकता व भेदभाव की उपस्थिति की सबसे बड़ी वजह किताबों की अनुपस्थिति है। इसी कारण से हम बहुत से संतों-महापुरूषों के नाम लेते हैं। उनकी पूजा भी करते हैं, लेकिन उनके विचारों को जानते तक नहीं। आईये आज के दिन हर गांव में पुस्तकालय और हर विद्यार्थी के हाथ में किताब, उसके अध्ययन और विचार-विमर्श को मुद्दा बनाएं।

Wednesday, April 22, 2020

BLOOD DONATION IN BLOOD BANK KARNAL DURING LOCKDOWN

लॉकडाउन में ब्लड बैंक में किया जा सकता है रक्तदान

रैडक्रॉस सोसायटी के डीटीओ एमसी धीमान रक्तदाताओं को लाने में जुटे


करनाल, 22 अप्रैल
लॉकडाउन के चलते रक्तदान शिविर आयोजित नहीं हो पाने के कारण अस्पतालों में खून की निरंतर जरूरत पड़ रही है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए रैडक्रॉस सोसायटी करनाल व सेंट जॉन एंबूलैंस इंडिया करनाल के द्वारा आए दिन रक्तदताओं को प्रेरित किया जा रहा है। रैडक्रॉस सोसायटी के जिला प्रशिक्षण अधिकारी एमसी धीमान स्वयंसेवियों से सम्पर्क करके ब्लड बैंक में रक्तदान करवा रहे हैं। बुधवार को इन्द्री क्षेत्र से प्राध्यापक अरुण कुमार कैहरबा, अध्यापक जसविन्द्र पटहेड़ा, गांव कमालपुर रोड़ान से सुनील कुमार, कमल कुमार व विनोद कुमार सहित कुल 22 स्वयंसेवियों ने ब्लड बैंक में पहुंच कर रक्तदान किया। जबकि मंगलवार को 18 स्वयंसेवियों ने रक्तदान किया था। ब्लड बैंक इंचार्ज डॉ. संजय वर्मा के नेतृत्व में रजनी, मंजू, अनिल, राजकुमार व धर्मपाल सहित ब्लड बैंक की टीम सामाजिक दूरी की पालना करवाते हुए रक्तदाताओं को लाने, पंजीकरण व रक्त एकत्रित करने के काम में लगी हुई है।

थैलिसीमिया के मरीजों, अनिमिक मरीजों, दुर्घटना के शिकार घायलों व गर्भवती महिलाओं को समय-समय पर रक्त की जरूरत पड़ती है। लेकिन लॉकडाउन के कारण रक्तदान शिविर आयोजित नहीं हो पाने के कारण जरूरत के अनुसार रक्त जुटाना एक चुनौति है। रैडक्रॉस सोसायटी के डीटीओ एमसी धीमान ने बताया कि जिला के स्वयंसेवियों से निरंतर संपर्क करते हुए ब्लड बैंक में रक्तदान करवाया जा रहा है, ताकि जरूरतमंदों को खून की कमी नहीं आए। उन्होंने कहा कि रैडक्रॉस सोसायटी के साथ विभिन्न स्वयंसेवियों व संस्थाओं का संकल्प है कि खून की कमी में किसी की जान ना जाने पाए। उन्होंने कहा कि इस काम में मानव केयर संस्था के संजय गुप्ता, समाजसेवी संदीप सचदेवा व अन्य स्वयंसेवियों का उन्हें पूरा सहयोग मिल रहा है।
एमसी धीमान जरूरत के अनुसार रक्तदान करवाने के लिए दिन-रात सक्रिय रहते हैं। शाम व रात को भी स्वयंसेवियों के पास फोन आते हैं तो वे उनको ब्लड-बैंक में लाने की योजना बनाते हैं और एक-एक रक्तदाता से संपर्क करके उन्हें ब्लड बैंक तक लाते हैं। वे रक्तदान से जुड़ी हुई भ्रांतियों को दूर करने के लिए भी कार्य करते हैं। उन्होंने बताया कि रैड क्रॉस के स्वयंसेवी मनीष कुमार, कर्मचंद चड्ढ़ा ब्लड बैंक में रक्तदान के दौरान सेवाएं दे रहे हैं।
डॉ. संजय वर्मा ने बताया कि रक्तदान करने से शरीर को कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि फायदा होता है। कोई भी स्वस्थ व्यक्ति तीन महीने के बाद रक्तदान कर सकता है। उन्होंने कहा कि रक्तदान से जुड़ी हुई भ्रांतियों को दूर करने के लिए सभी स्वयंसेवियों को कार्य करना चाहिए।
रक्तदान के लिए रक्तदाता को लाने के लिए घर पर जाएगी गाड़ी-
मसी धीमान व डॉ. संजय ने बताया कि इस संकट के समय में रक्तदाता बढ़-चढ़ कर आगे आएं। रक्तदाताओं को घर से ही लाने और ले जाने के लिए ब्लड बैंक की गाड़ी भेजी जाती है। कोई भी रक्तदाता एमसी धीमान के मोबाइल नंबर- 9416121414 पर संपर्क कर सकता है। प्राध्यापक अरुण कुमार कैहरबा ने अपील करते हुए कहा कि रक्तदान करने में संकोच ना करें। सामाजिक दूरी की पालना करते हुए नागरिक अस्पताल की गाड़ी में घर से निकलें और ब्लड बैंक पहुंच कर रक्तदान करें।

मास्क वितरण के साथ सामाजिक दूरी का संदेश दे रही रैडक्रॉस सोसायटी-
एमसी धीमान ने बताया कि रैडक्रॉस सोसायटी रक्तदान को बढ़ावा देने के साथ-साथ लोगों को सामाजिक दूरी बनाए रखने, घर में ही रहने और लॉकडाउन की पालना करने लिए प्रेरित कर रही है। इसके साथ-साथ जरूरतमंद लोगों को मास्क बांटे जा रहे हैं। बुधवार को रैडक्रॉस सायायटी के ब्रिगेड प्रभारियों ने घरौंडा, अराईंपुरा व कैमला में मास्क वितरित किए। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के दौरान अब तक सोसायटी पांच हजार के करीब मास्क वितरित कर चुकी है।

Sunday, April 5, 2020

#9बजे9मिनट BAS BAHANE

कविता- बस बहाने

कुछ लोग कहां मानें हैं
वो तो बस दीवाने हैं

कुछ टोटके बताए थे
बाकी तो बस छिपाए थे
नौ बजे नौ मिनट तक दीप जलाना
कोरोना को बस यूं भगाना
बाकी के टोटके नहीं बताने हैं
वे तो बस पूरे करवाने हैं
कुछ लोग..
दीप जलाकर लोग उत्साहित हुए
भाव इतने तेज प्रवाहित हुए
गलियों में लोगों के लग गए जमघट
हिलोरें लेने लगा उल्लास
जैसे दिवाली की हो आहट
लोग यहीं तक नहीं मानें हैं
वे तो ना जाने क्या ठाने हैं
कुछ लोग..
दिए के साथ में बम फोडऩा तो बनता है
कोरोना की कड़ तोडऩा तो बनता है
ऐसे कोरोना कहां सुनेगा
बमों के शोर में भागा फिरेगा
भक्त जनों के पक्के निशानें हैं
दीप जलाने के तो बस बहाने हैं 
-अरुण कुमार कैहरबा

SARTHAK KI KAHANI- DOSTI

बाल कहानी-     दोस्ती

रचनाकार-सार्थक

एक बार की बात है कि फल और सब्जी बड़े प्रेम से रहते थे। फलों और सब्जियों का आपस में भाईचारा था। फलों का राजा आम और सब्जियों का राजा आलू भी एक दूसरे के राज्य में कईं बार यात्रा करते थे। एक दिन शीलू गाजर ने फलों के राज्य में यात्रा करने की सोची। वह सुबह ही यात्रा पर निकल पड़ी। रात को वह फलों के राज्य में पहुंच गई। वह फलों के राज्य के बाजार में थी। वहां पर उसने सोचा कि जिसके घर मैं रहूंगी, उसके लिए थोड़ी मिठाई ले चलती हूँ। वह खुश हो जाएगा। वह मोती हलवाई की दुकान पर चढ़ी और बोली- ‘आधा किलो जलेबी देना।’
मोती जलेबी देते-देते बोला- ‘आप परदेशी लगती हैं।’
‘हां मैं यहां घूमने आई हूँ’- शीलू बोली
शीलू जलेबी लेकर जोजो लीची के घर पहुंची। जोजो ने शीलू का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। उसे पानी पिलाया। फिर दोनों आपस में बैठ कर बातें करने लगे। दोनों ने जलेबी खायी। जोजो लीची बोली-हम कुल्ला करके आते हैं। अगर कुल्ला नहीं करेंगे तो दांत में कीड़े लग जाएंगे। दोनों ने कुल्ला करके 5 मिनट टीवी पर मैच देखा और बैड पर सोने के लिए चले गए। शीलू गाजर थकी होने के कारण जल्दी सो गई। वे दोनों सुबह जल्दी उठ गए। फिर दोनों हर्बल पार्क में मोर्निंग वॉक करने गए। साथ में उन्होंने झूले भी झूले। झूला झूलते-झूलते शीलू गाजर से जोजा लीची को ठोकर लग गई। गोल-मटोल जोजो नीचे जा गिरी और उसकी टांग पर चोट आ गई। जोजो को लगा कि शीलू ने जानबूझ कर उसे मारा है। जोजो को बहुत गुस्सा आया। वह दौड़ कर फलों के राजा आम के पास गई। उसने अपने राजा से शीलू गाजर की शिकायत लगाई। राजा ने सब्जियों के राजा आलू के साथ टेलीफोन पर बात की-तुम्हारे राज्य की शीलू गाजर ने हमारे राज्य की जोजो लीची को झूले से नीचे गिरा दिया है और जोजो को गंभीर चोटें आई हैं। इसे हम कतई स्वीकार नहीं करेंगे। उसने कहा कि हम मीठे हैं तो क्या आप हमें मार कर चले जाएंगे। राजा आम को ऐसा गुस्सा पहली बार आया था। आम के मुंह से ऐसी कड़वी बातें सुन कर सब्जियों के राजा आलू का गुस्सा भी सातवें आसमान पर जा पहुंचा। उसने फोन पर ही जंग का ऐलान कर दिया। सुबह की ट्रेन पकड़ कर शीलू गाजर फलों के राज्य से अपने राज्य में पहुंच गई। वह सीधे आलू राजा के पास पहुंची। उसने आलू राजा को शिकायत लगाई कि गलती से उसका पैर जोजो को छू गया था और उसने आसमान सर पर उठा लिया।  आलू राजा फलों के राजा आम की जली-कटी बातें सुन कर पहले ही गुस्से में था। उसने अपनी सेना को जंग की तैयारी का आदेश दे दिया था। उसने कहा कि अब तो जंग ही एकमात्र उपाय है। राजा के गुस्से को देख कर कोई उन्हें समझाने की हिम्मत नहीं कर रहा था। राजा आलू ने अपनी सेना लेकर फलों के राज्य में कोहराम मचा दिया। वहां जाते ही एक बड़े वाहन में आग लगा दी। उसके कारण दूसरे वाहन में भी आग लग गई। उसके बाद राजा आलू और उसके सिपाहियों ने फलों के राजा के महल में आग लगा दी। उसमें राजा आम के 500 सिपाही थे और 105 सिपाही मर गए। राजा आम बच गए। राजा आम ने भी धावा बोल दिया। दोनों राजाओं की सेनाओं में जमकर लड़ाई हुई। दोनों सेनाओं के कितने ही सैनिक मारे गए। तभी सब्जियों में समझदार सिमी लौकी और फलों में से कीकू केला बीच में आए और चिल्लाए- ‘रूको।’ सारे सिपाही रूक गए। 
कीकू बोला-‘यह क्या कर रहे हो। क्यों एक दूसरे का जीवन बर्बाद कर रहे हो। आपको पता है कि राज्य में कितना नुकसान हो गया है। कितनी दुकानें जलकर राख हो गई हैं। हम सभी को एक साथ रहना है।’ 
सिमी बोली-‘आपस में लड़-झगड़ कर हम आगे नहीं बढ़ सकते। तुम देख नहीं रहे कि कितना खून बह गया है। कितने लोग मारे गए हैं।’ 
फलों का राजा बोला ‘तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद हमें गलती का अहसास कराने के लिये। अब हम जीवन की नई शुरूआत करेंगे, जिसमें दोनों राज्यों के सभी सदस्य प्रेम और दोस्ती से रहेंगे।’ 
-सार्थक
पता-वार्ड नं.-4, रामलीला मैदान, इन्द्री, जिला-करनाल, हरियाणा-132041