Monday, September 14, 2020

डाइट तेजली ने एससीईआरटी के मार्गदर्शन में आयोजित किया हिन्दी दिवस वेबीनार

 हिन्दी देश के एकीकरण व गौरव की भाषा: नमिता कौशिक


डीईओ ने हिन्दी दिवस पर वेबीनार का किया शुभारंभ

यमुनानगर, 14 सितंबर



एससीईआरटी के मार्गदर्शन में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान तेजली के तत्वावधान में हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में वेबीनार का आयोजन किया गया। वेबीनार में जिला भर के विभिन्न स्कूलों में पढ़ा रहे हिन्दी अध्यापकों एवं प्राध्यापकों ने हिस्सा लिया। वेबीनार का मार्गदर्शन एससीईआरटी हिन्दी विशेषज्ञ सीमा वधवा ने किया। वेबीनार की शुरूआत करते हुए जिला शिक्षा अधिकारी एवं डाईट प्राचार्या डॉ. नमिता कौशिक ने कहा कि हिन्दी हमारे देश के एकीकरण के साथ-साथ गर्व एवं गौरव की भाषा है। आज हिन्दी का प्रयोग जनसंचार, कम्प्यूटर एवं तकनीकी सहित हर क्षेत्र में किया जा रहा है। उन्होंने अपने बातचीत व कार्यों में अधिकाधिक हिन्दी प्रयोग करने का संदेश दिया। वेबीनार का संयोजन डाईट के हिन्दी विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक तरसेम चंद व राजकीय उच्च विद्यालय करेड़ा खुर्द में हिन्दी प्राध्यापक अरुण कुमार कैहरबा ने किया। वेबीनार में यमुनानगर के प्रसिद्ध साहित्यकार ब्रह्मदत्त शर्मा, विनय मोहन, बलदेव राज भारतीय व उमेश प्रताप वत्स ने हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए अपने विचार रखे और रचनाएं सुनाई। 

हिन्दी सहित मातृभाषाओं को दें बढ़ावा: अरुण


हिन्दी भाषा के विकास की पृष्ठभूमि एवं वर्तमान दशा पर प्रकाश डालते हुए अरुण कैहरबा ने कहा कि पालि, प्राकृत, अपभ्रंश एवं अवह_ से हिन्दी का जन्म हुआ। हिन्दी का इतिहास करीब एक हजार साल पुराना है। आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल तक साहित्य के विकास की अनंत धारा है। संत कबीर, गरीबदास, सूरदास, मीरा, जायसी, तुलसी, भारतेंदु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला, महादेवी, फणीश्वरनाथ रेणु सहित कितने ही रचनाकारों ने हिन्दी के साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने हिन्दी की उपेक्षा पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस सहित दुनिया के मातृभाषाओं में काम करने वाले देशों की तरक्की के बावजूद आज भी भारत में लोग अंग्रेजी के बिना तरक्की की कल्पना नहीं कर पा रहे हैं। 

विदेशी भाषा का मोहपाश खतरनाक: तरसेम


तरसेम चंद ने अनेक कविताएं सुनाई और हिन्दी को समृद्ध बनाने में अग्रणी भूमिका निभाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी दासता से मुक्ति के साथ ही हमें साम्राज्यवादी दासता के सारे चिह्नों को समाप्त करना था, लेकिन विडंबना ही है कि आज तक हम विदेशी भाषा के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाए हैं।

बाल पत्रिका नंदन का बंद होना चिंताजनक: ब्रह्मदत्त


साहित्यकार ब्रह्मदत्त शर्मा ने कहा कि हिन्दी की उपेक्षा के बावजूद हिन्दी बढ़ रही है। परिवारों में बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने की होड़ लगी है। महानगरों से होकर गांव के गली मोहल्लों में भी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल गए हैं। उन्होंने कहा कि हमें हिन्दी के प्रति शुद्धतावादी नजरिया छोडऩा होगा। उन्होंने बाल पत्रिका नंदन के बंद होने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बच्चों को पढऩे के लिए अच्छा साहित्य प्रदान किए बिना हम हिन्दी को आगे नहीं बढ़ा सकते। उन्होंने बच्चों में हिन्दी के संस्कार बढ़ाने के लिए पढऩे की संस्कृति विकसित करने की जरूरत को रेखांकित किया।

हिन्दी का लचीजा काबिले-तारीफ: विनय


लघुकथाकार विनय मोहन खारवन ने कहा कि हिन्दी का लचीलापन काबिले तारीफ है। कितने ही क्लिष्ट शब्दों को लोग नहीं जानते, जबकि उनके स्थान पर अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने अपनी एक लघुकथा सुनाकर बताया कि किस तरह हमारी मातृभाषा हमारे सबसे नजदीक होती है। भले ही हम कितनी भाषाओं में पारंगत हो जाएं, लेकिन हमारे सुख-दुख के हमारे सहज-स्वाभाविक भाव मातृभाषा में ही प्रकट होते हैं।

विदेशी भाषा में शिक्षण से बच्चे समाज से कट रहे: भारतीय


समाचार-पत्रों में निरंतर लेखन करने वाले साहित्यकार बलदेव राज भारतीय ने हिन्दी लेखन में पदार्पण की प्रेरणादायी कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि हम अपनी भाषा से दूर जा रहे हैं। नन्हें बच्चों पर अंग्रेजी भाषा का बोझ लाद दिया जाता है, जोकि उनके परिवेश में नहीं होती और परिवेश की भाषा उन्हें नहीं आती। इस तरह से बच्चे समाज से ही कटते जा रहे हैं। उन्होंने हिन्दी पर अपनी पुरानी और नई कविताएं सुनाते हुए हिन्दी की दशा को रेखांकित किया।

हिन्दी से होगी उन्नति: वत्स


साहित्यकार डॉ. उमेश प्रताप वत्स ने ओजपूर्ण आवाज में अपनी गीत-कविताएं सुनाकर हिन्दी को मातृ समान सम्मान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हिन्दी के माध्यम से देश उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकता है।

एक दिन हिन्दी दिवस मना लेने से नहीं बनेगी बात: नागी

HARYANA PRADEEP 17-09-2020

रेखा राणा, भूपिन्द्र कौर, वीना रानी, शिव कुमार, रविन्द्र कुमार कलावड़, डॉ. गायित्री मल्होत्रा, सुरेश कुमार, रजनी रानी, अनिता कौशल ने स्कूलों में मनाए गए हिन्दी पखवाड़ा की रिपोर्ट रखी। डाईट की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. उषा नागी ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि केवल एक दिन हिन्दी दिवस मना लेने से बात बनने वाली नहीं है। हिन्दी को हर रोज अपने आचरण व व्यवहार का हिस्सा बनाना होगा।

 वेबीनार में डाईट के एसोसिएट प्रोफेसर राकेश गुप्ता, अशोक राणा, सुरेन्द्र अरोड़ा, दुष्यंत चहल, डॉ. संजीव कुमार, अमरजीत सिंह, तेजपाल वालिया, सुमन रानी, मिनिस्टिरियल स्टाफ के उपाधीक्षक रविन्द्र कुमार शर्मा, संदीप कुमार, एसए जगदीप कुमार, रवि, संदीप, रीटा, प्रदीप, पुष्पा, रविन्द्र उपस्थित रहे।


Saturday, September 12, 2020

हिन्दी की उपेक्षा से लोकतंत्र हो रहा कमजोर

 हिन्दी दिवस विशेष

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

अरुण कुमार कैहरबा


भाषा हमारे जीवन का पर्याय है। भाषा केवल विचार-अभिव्यक्ति का ही साधन नहीं है, बल्कि सोचने का भी माध्यम है। भाषा के बिना हम समाज-संस्कृति व साहित्य की कल्पना नहीं कर सकते। मनुष्य के साथ-साथ भाषा का और भाषा के साथ-साथ मनुष्य का विकास हुआ।
भारत की भाषायी विविधता दुनिया भर के लिए आश्चर्य का विषय है। संविधान की 8वीं अनुसूची में ही 22 भाषाएं हैं। इसके अलावा भी सैंकड़ों भाषाएं और बोलियां हैं। शायद ही दुनिया के किसी देश में इतनी अधिक भाषाएं और बोलियां हों और उनमें ज्ञान का इतना विपुल भंडार हो। लेकिन साथ ही ऐसा भी शायद ही कोई देश होगा, जहां पर इतनी समृद्ध भाषाएं होने के बावजूद शासन व लोगों में अन्य किसी भाषा के प्रति इतनी दीवानगी हो। औपनिवेशिक गुलाम मानसिकता की प्रतीक अंग्रेजी भाषा सीखने-सिखाने का धंधा यहां चरम पर है। यहां पर गांव-गांव में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुलते ही जा रहे हैं। हिन्दी या मातृभाषाओं के गलती से भी शब्द उच्चारित होने की स्थिति में आर्थिक-शारीरिक दंड दिया जाता है। सरकारी स्तर पर अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा देने को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के रूप में प्रचारित किया जाता है। हिन्दी को प्रचारित करने के लिए हिन्दी दिवस, हिन्दी साप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा मनाए जाते हैं, जिनमें हिन्दी बुलवाने के लिए ईनाम दिए जाते हैं। यह बेहद विड़ंबनादायी स्थिति है। सवाल यह है कि क्या दिवस, सप्ताह व पखवाड़े मनाकर ही किसी भाषा को बचाया जा सकता है?
लोकतंत्र की सफलता में भाषा का महत्वपूर्ण स्थान है। लेकिन हमारे यहां भाषा के नाम पर देश को बांटने का काम हो रहा है। सत्ताधीशों ने जन भाषाओं को कभी स्वीकार्यता नहीं दी। संविधान में भाषा का दर्जा तो दिया गया। लेकिन आम जन की भाषा को राजकाज के काम में लेने में हमेशा गुरेज किया जाता रहा। हिन्दी की ही बात करें तो संविधान में हिन्दी को पूरे तौर पर राजभाषा के रूप में विकसित करने के लिए 15वर्ष तक का समय दिया गया था। इतने तक अंग्रेजी को राजभाषा के रूप में इस्तेमाल करने की छूट थी। लेकिन मानसिक गुलामी का शिकार शासन व नौकरशाही में बैठा देश का आभिजात्य वर्ग संविधान की मूलभावना को पूरा करने में असफल रहा। संभवत: यह आम लोगों को सत्ता से दूर रखने का ही एक प्रयास था। क्योंकि हिन्दी व भारतीय भाषाओं को राजभाषा के रूप में इस्तेमाल किया जाता तो इससे अंतत: देश की आम जनता ही सशक्त होती और लोकतंत्र मजबूत होता। आज शिक्षा, प्रशासन हो या न्यायपालिका हर क्षेत्र में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। न्यायालयों की कार्रवाई और निर्णयों का उन लोगों को पता तक नहीं होता, जिनके वर्षों न्यायालयों चक्कर काटते गुजर जाते हैं। हरियाणा के एक जिला न्यायालय में किसान अपने मामले की खुद पैरवी कर रहा था। वह अपनी बात कहने लगा तो जज ने कहा- मुझे आपकी बात समझ में नहीं आ रही। आप वकील कर लीजिए। किसान ने तुरंत जवाब दिया- आपको मेरी भाषा समझ नहीं आती तो आप करो वकील।
किसी भाषा को आगे बढ़ाने में उसके पढ़े-लिखे वर्ग की जिम्मेदारी होती है। लेकिन भारत विशेष तौर पर हिन्दी भाषी क्षेत्र के पढ़े-लिखे वर्ग ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। वह औपनिवेशिक भाषा अंग्रेजी का पिछलग्गू बना रहा या अपने ही हित साधता रहा। जिन हिन्दी विद्वानों को हिन्दी की क्षमता को बढ़ाते हुए लोगों की अभिव्यक्ति सामथ्र्य को समृद्ध करना था, उन्होंने हिन्दी को संस्कृतनिष्ठता के चंगुल में उलझाने की ही कोशिश की। जिससे हिन्दी और अधिक क्लिष्ट और जटिल होती चली गई। हिन्दी फिल्मों ने इस पर व्यंग्यात्मक अंदाज में कड़ी प्रतिक्रिया की। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को उपहास का पात्र दिखाया गया, लेकिन हिन्दी विद्वान इसे उलझाते ही गए। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र सहित कितने ही गैर-हिन्दी राज्यों के स्वतंत्रता सेनानियों व समाज सुधारकों तक ने हिन्दी की पक्षधरता की। महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा था- राष्ट्रभाषा का स्थान हिन्दी ही ले सकती है, कोई दूसरी भाषा नहीं। राजाराम मोहन राय, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सहित कितनी ही शख्सियतों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की पक्षधरता की। आजादी के बाद जितने भी शिक्षा आयोग व शिक्षा नीतियां बनीं, सभी ने हिन्दी व मातृभाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाए जाने की बात की। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाओं में देने की बात कर रही है। इसके बावजूद बाजार के हितों की रक्षा करने के लिए हिन्दी व भारतीय भाषाओं की उपेक्षा की जा रही है। यदि लोगों को यह लगता है कि हिन्दी व मातृभाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाया गया तो देश पिछड़ जाएगा, तो हमें जापान, चीन, जर्मनी, फ्रांस सहित मातृभाषाओं को शिक्षा व राजकाज का माध्यम बनाने वाले देशों से सीखना चाहिए। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा भी है-
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय का सूल।।
प्रचलित करो जहान में निज भाषा करि जत्न।
राज काज दरबार में फैलावहु यह रत्न।।
मो.नं.-9466220145 
NABH CHOR 12-09-2020

Why and how moral education should be in schools

स्कूलों में नैतिक शिक्षा क्यों और कैसे हो?

अरुण कुमार कैहरबा


हमारा समाज जातिवाद, लैंगिक असमानता, भेदभाव, नशा, हिंसा, भ्रष्टाचार जैसी अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। शिक्षा की प्रक्रिया से समाज की सभी समस्याओं के बारे में बच्चों व युवाओं में तार्किक दृष्टि और अपेक्षित मूल्यों के विकास की अपेक्षा की जाती है। संभवत: यही नैतिक शिक्षा की प्रक्रिया है। नैतिक शिक्षा पर विचार करते हुए यह भी ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि हर समय, स्थान व समाज की नैतिकताएं भिन्न हो सकती हैं। नैतिक शिक्षा व्यवहार का विषय है। समाज को जिम्मेदारी से बरी करके केवल स्कूल नैतिक मूल्यों के विकास के मामले में चमत्कार नहीं कर सकते।

यह माना जा सकता है कि नैतिक शिक्षा बेहद जरूरी है। लेकिन जिस तरह से नैतिक शिक्षा को अलग विषय बनाकर इसे पढ़ाए जाने की वकालत की जाती है, उससे हमारी सहमति नहीं है। स्कूली शिक्षा का प्रत्येक पहलु नैतिक शिक्षा से संबद्ध होता है और होना भी चाहिए। प्रात:कालीन सभा से यदि नैतिक मूल्यों को अलग कर दें तो रहता ही कुछ नहीं है। अध्यापक का आचरण भी नैतिक शिक्षा का स्रोत होना चाहिए। स्कूल का पूरा वातावरण ऐसा मनोरम होना चाहिए, विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों व संवेदनशीलता का विकास हो। हर विषय की पाठ्यचर्या में इतनी संभावनाएं होती हैं कि उनका शिक्षण करते हुए विद्यार्थियों में तार्किकता, संवेदनशीलता, विचारशीलता व कल्पनाशीलता का विकास हो सकता है। अध्यापक उन अवसरों को पहचान कर विद्यार्थियों के मन-मस्तिष्क पर असर डालने की कोशिश करते हैं। सीखने की क्रियाओं में विद्यार्थियों की भागीदारी नैतिक शिक्षा का स्रोत है। स्कूली शिक्षा में भाषाओं के साहित्य और चित्रकला व अन्य कलाओं के विषय तो नैतिक मूल्यों से ही ओतप्रोत होते हैं। कविताएं जहां विद्यार्थियों को सोचने पर मजबूर करती हैं, वहीं ज्ञान देते हुए उनका मनोरंजन भी करती हैं। कहानियों के विभिन्न पात्र अपने-अपने संवादों के जरिये विद्यार्थियों में अच्छे-बुरी की पहचान को और अधिक साफ करते हैं। कहानी पढऩे के बाद विद्यार्थी उस पर चर्चा करते हुए अनेक पहलुओं से अवगत होते हैं। हमें लगता है कि नैतिक शिक्षा को अलग विषय बना देने, इसके लिए अलग पुस्तकें और कालांश निर्धारित करने और परीक्षाएं लेने से नैतिक शिक्षा अपना अर्थ खा देगी। समाज और स्कूल का समस्त जीवन संवेदनशीलता और विचारशीलता से भरा हो तो विद्यार्थियों में अपने समाज की समस्याओं की बेहतर समझ पैदा होगी। उनके लिए नैतिक शिक्षा के उपविषय रटने का कारण नहीं बनेंगे, बल्कि वह जीवन में उनका अनुसरण करेंगे। नैतिक शिक्षा के लिए स्कूलों में अध्यापक पूरे हों, सुविधाएं हों और सभी मिलकर कार्य करें। यह अति आवश्यक है।

मो.नं.-9466220145    

 

Thursday, September 10, 2020

Babu Moolchand Jain was a great freedom fighter and Gandhian leader



 पुण्यतिथि विशेष

महान स्वतंत्रता सेनानी और जनहितैषी गांधीवादी नेता थे बाबू मूलचंद जैन

अरुण कुमार कैहरबा 

आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले सेनानियों और आजादी के बाद में देश के नवनिर्माण में सक्रिय हिस्सेदारी करने वाले नेताओं की हरियाणा में कमी नहीं है। उन्हीं में से एक हैं हरियाणा के गांधी के रूप में प्रसिद्ध बाबू मूलचंद जैन। सम्मान में उन्हें लोग बाबू जी कहकर पुकारते हैं और उनके कार्यों की चर्चा करते हैं। देश को गुलामी की बेडिय़ों से मुक्त करवाने के लिए उन्होंने गांधी जी के विचारों का अनुसरण करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, जेलें काटी और आजादी के बाद लोकसभा सदस्य, संयुक्त पंजाब की विधानसभा सदस्य, कैबीनेट मंत्री, हरियाणा विधानसभा सदस्य, वित्त मंत्री और अनेक भूमिकाओं में देश-प्रदेश के नवनिर्माण में अपना योगदान दिया। उन्होंने हरियाणा को अलग राज्य बनाने के आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। जातिवाद और छूआछूत को समाज विकास की सबसे बड़ी बाधा मानने वाले मूलचंद जी ने आजीवन समाज के वंचित वर्ग के हितों में कार्य किया। हालांकि गांव-गांव में पुस्तकालय स्थापित करने के लिए कोई बड़ा आंदोलन शुरू नहीं हो पाया, लेकिन वे बच्चों व युवाओं में पढऩे की संस्कृति के विकास को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे। इस उद्देश्य से अपने जीवनकाल में ही उन्होंने अपने गांव में पुस्तकालय की स्थापना की थी।
Babu Mool Chand Jain as MP with PM Nehru & other MPs.

Babu Mool Chand Jain with PM Lal Bhadur
Shastri & Balwant Rai Tayal.

बाबू मूलचन्द जैन का जन्म 20अगस्त, 1915 को तत्कालीन रोहतक और अब सोनीपत जिला की तहसील गोहाना के गांव गांव सिकंदरपुर माजरा में हुआ था। उन्होंने गांव के स्कूल से 1925 में प्राथमिक शिक्षा, गोहाना के राजकीय स्कूल से 1931 में मैट्रिक प्रथम श्रेणी में पास की। 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, सुखदेव सिंह और राजगुरु को फांसी दिए जाने के विरोध में गोहाना में हुए विरोध प्रदर्शन में उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 1935 में लाहौर से बी.ए. की परीक्षा पास की। पढ़ाई के दिनों में वे अपने उदार हृदय के लिए जाने जाते थे। 1937 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से कानून की परीक्षा पास की और प्रथम स्थान लेने के लिए उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। इसके बाद वकालत शुरू की। गांधी जी के आह्वान पर स्वतन्त्रता आंदोलन में कूद पड़े। 1938 में रोहतक के असौंधा गांव में कांग्रेस की सभा पर जमींदारा लीग के हजारों कार्यकर्ताओ ने हमला बोलकर कांग्रेस के अनेक कार्यकर्ताओं को घायल कर दिया था। जिसमें बाबू जी भी थे। 1941 में गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में उन्होंने बढ़चढ़ कर भाग लिया। 6 मार्च 1941 को बाबू जी ने अपनी जन्मभूमि गांव सिकन्दरपुरा माजरा से ही सत्याग्रह शुरू कर दिया तथा स्वतन्त्रता सेनानी चौधरी रणवीर सिंह हुड्डा की उपस्थिति में गिरफ्तारी दी। बाबू जी ने एक साल की सजा गुजरात (मौजूदा पाकिस्तान) जेल में काटी। सन् 1942 में गांधी जी द्वारा छेड़े गए भारत छोड़ो आंदोलन में बाबू जी के भाग लेने पर 11 अगस्त 1942 को उन्हें करनाल कचहरी में गिरफ्तार कर लिया गया और नजरबन्द करके उन्हें पुरानी केन्द्रीय जेल मुल्तान भेज दिया। जहां उन्हें एक साल से अधिक रहना पड़ा।
HARYANA PRADEEP 12-09-2020

ARTH PARKASH 12-09-2020
आजादी के बाद बाबूजी जिला कांग्रेस करनाल के महासचिव व बाद में जिला प्रधान बने। वह गरीबों व मुजारों की वकालत मुफ्त ही किया करते थे। उन्होंने 1948 से 52 तक साप्ताहिक समाचार-पत्र ‘बलिदान’ का संपादन किया। इस दौरान उन्होंने मुजारों को 5-5 एकड़ भूमि दिलवाने के लिए लिखा और आंदोलन किया। वे जात-पात और छूआछूत जैसी समस्याओं को समाप्त कर देना चाहते थे। कॉलेज में पढ़ते हुए जब उन्हें पता चला कि गांव में उच्च वर्ग के कूएं से दलितों को पानी भरने नहीं दिया जाता तो उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष किया और कूएं से दलितों को पानी भरने का हक दिलाकर ही दम लिया।
बाबू मूलचंद जैन 1952 में पहली बार समालखा से विधायक बने तथा सरदार प्रताप सिंह कैरो के मंत्रीमण्डल में लोक निर्माण मंत्री बने। 1957 में कैथल से लोकसभा के सदस्य चुने गए। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें विभिन्न संसदीय कमेटियों का सदस्य बनाया। पंचायती राज कमेटी के सदस्य के रूप में उन्हें विभिन्न राज्यों में काम करने का अवसर मिला। इसके बाद उन्हों राज्य की राजनीति का रूख किया। 1962 में घरौंडा से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा। परन्तु तत्कालीन मुख्यमन्त्री प्रताप सिंह कैरो के अंदरूनी विरोध के कारण चुनाव हार गए। 1965 में बाबू जी ने हरियाणा को पंजाब से अलग प्रांत बनाने के लिए चलाए गए आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। इस उद्देश्य से बनाई ऑल पार्टी हरियाणा एक्शन कमेटी के महासचिव बने। इस कमेटी के अध्यक्ष जननायक चौ. देवी लाल थे। कमेटी के अथक प्रयासों से हरियाणा अलग राज्य बना। कांग्रेस की टिकट पर 1967 में घरौंडा से विधायक बने और इसके एकदम बाद मतभेदों के चलते दलबदल करते हुए विशाल हरियाणा पार्टी के राव बीरेन्द्र सिंह के मंत्रीमण्डल में राज्य के वित्तमन्त्री बने। 1968 में उन्होंने विशाल हरियाणा पार्टी के टिकट पर इन्द्री से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं पाए।
Babu Mool Chand Jain with Vinoba Bhave - Bhoodam Movment-1961

1973-75 के दौरान उन्होंने लोकनायक जय प्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और हरियाणा संघर्ष समिति की कार्यकारिणी के सदस्य बने। सन् 1975 में आपातकाल के दौरान 19 महीने जेल में रहे। 1977 में समालखा से जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बने तथा 1978 में चौधरी देवीलाल के मंत्रीमण्डल में वितमन्त्री बने। 1980-82 के दौरान राज्य में विपक्ष के नेता रहे। 1985-87 में बाबू जी ने राजीव लोगोंवाल समझौता की धारा 7 व 9 विरोध किया तथा चौ. देवीलाल द्वारा चलाये गये न्याय युद्ध आंदोलन में भाग लिया व इस दौरान जेल भी गये। 1987 में देवीलाल की सरकार बनने के बाद वे योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष बने तथा इस दौरान उन्होंने राज्य में शिक्षा के प्रसार के लिए पुस्तकालय आंदोलन व नैतिक शिक्षा पर विशेष बल दिया। उन्होंने जुलाई 1989 मे तत्कालीन मुख्यमंत्री से मतभेदों के कारण योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।

20अगस्त, 1990 को  75वें जन्मदिन पर  करनाल आयोजित भव्य समारोह में उन्हें सम्मानित किया गया।
मूलचंद जैन मौजूदा शिक्षा ढ़ांचे में व्यापक बदलाव के पक्षधर थे। 1989 में  उनके प्रयासों से सरकार ने सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम बनाया। 1992-96 के दौरान सरकार ने उन्हें पुस्तकालय को लेकर स्टैंटिंग एडवाइजरी कमेटी का अध्यक्ष और राज्य पुस्तकालय प्राधिकरण का सदस्य बनाया। पुस्तकालयों की स्थापना में उन्होंने अहम योगदान दिया। अपने 76वें जन्मदिन पर 20अगस्त, 1991 को अपने पैतृक गांव सिकंदरपुर माजरा में अपने पैतृक निवास को एक आदर्श पुस्तकालय के रूप में परिवर्तित कर गांव व क्षेत्र के लोगों को समर्पित कर दिया। तभी से साल गांव के लोग बाबू जी के जन्मदिन को पुस्तकालय दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। पुस्तकालय दिवस पर उनके जीवन काल में ही अनेक हस्तियां गांव में आ चुकी थी। 
मूलचंद जैन हरियाणा व पंजाब राज्य में जीवन भर शैक्षिक, सामाजिक, राजनैतिक, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के प्रचार-प्रसार के कार्यों में लगे रहे। 12 सितंबर, 1997 को करनाल स्थित आवास पर उनका देहांत हो गया। उनके निधन के बाद अगस्त 1998 में उनके 84वें जन्मदिन पर तत्कालीन उपराष्ट्रपति की पत्नी श्रीमती सुमनकांत जी की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में उनके पैतृक गांव सिकंदरपुर माजरा स्थित सरकारी स्कूल का नामकरण बाबू मूल चन्द जैन राजकीय उच्च विद्यालय रखा गया। अगस्त 2015 में बाबूजी के जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर हरियाणा सरकार ने बाबूजी के सम्मान में आईटीआई करनाल का नामकरण बाबू मूल चन्द जैन आईटीआई  रखा गया। 12सितंबर को उनकी 23वीं पुण्यतिथि पर आईटीआई में स्थापित की गई बाबूजी की मूर्ति का अनावरण उपायुक्त निशांत यादव द्वारा किया जा रहा है। मूलचंद जैन को एक विचारक, लोकहितैषी नेता और समाज सुधारक के रूप में हमेशा याद किया जाता रहेगा। 
मो.नं.-9466220145

JAMMU PARIVARTAN 12-09-2020



Tuesday, September 8, 2020

स्वयंभू कोरोना योद्धा फूल कर कुप्पा

 व्यंग्य

घर बैठे बने कोरोना योद्धा!

अरुण कुमार कैहरबा

कोरोना वायरस से उपजी महामारी ने दुनिया के हर वर्ग को बुरी तरह से प्रभावित किया है। करोड़ों लोगों का रोजगार छीन लिया है। लाखों लोग मारे गए हैं। धुरंधर देशों की अर्थव्यवस्था रसातल में जा लगी है। लेकिन फिल्मी गीत- ‘दीवाने दीवाने तो दीवाने हैं’ की तर्ज पर बहुत से लोग ऐसे वातावरण में भी मटरगश्ती करने से बाज नहीं आ रहे। संकट को अवसर की तरह भुनाना कोई उनसे सीखे। लॉकडाउन में डर के मारे घरों में दुबके पड़े रहे। लॉकडाउन के साथ ही रोजगार और आशियाना छिनने के बाद जब मजदूर अपने परिवार के साथ सामानों की पोटली व बोरिया-बिस्तर संभाले भूखे प्यासे अपने घरों की ओर जा रहे थे और रास्ते में पुलिस से पिट-छित रहे थे। तब यह अवसरवादी लोग अपने मोबाइलों पर गेम खेल रहे थे और सोशल मीडिया पर मनोरंजन करने में व्यस्त थे। इनमें से बहुत से लोग घरों में बैठे हुए कोरोना योद्धा का खिताब प्राप्त करके खुशी में फूले नहीं समा रहे थे। निठल्ले लोगों में कोरोना योद्धा बनने की होड़ लगी थी। अवसर का लाभ उठाकर कुछ लोगों ने इसे व्यवसाय नहीं तो एक शौंक में जरूर तब्दील कर दिया। रहनुमा की शक्ल में वे प्रशंसा-पत्र बांटने लगे। देखते ही देखते सोशल मीडिया रंगीन हो गया। फेसबुक की टाइमलाइनों पर प्रशंसा-पत्र चमचमाने लगे। लाइक और कमेंट करने वालों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। बिना कुछ किए सोशल मीडिया पर पीठ थपथपाने वालों की कमी नहीं है। एक तरफ लोग जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर मिलने वाली बधाइयों से स्वयंभू कोरोना योद्धा फूल कर कुप्पा हुए जा रहे हैं। कुछ लोग वाह-वाह कर रहे हैं और कुछ लोग पीड़ा में आह-आह कर रहे हैं।
JAGMARG 9-9-2020

जिन संस्थाओं के नाम कभी सुनने तक को ना मिले थे, वे आज प्रमाण-पत्र बांटने का काम कर रही हैं। प्रशंसा-पत्रों में उन लोगों का नाम छोटे अक्षरों में लिखा गया था जिनको यह दिए जा रहे हैं और जो देने वाले हैं उनके नाम बड़े बड़े अक्षरों में अंकित थे। बाहर नहीं निकल पाने की विवशता के कारण यह एक नया मनोरंजक खेल जैसा है जिसमें खाए-पीए-अघाए लोग मशगूल हैं। हमारे एक पड़ोसी हर दूसरे दिन कोरोना योद्धा का एक नया प्रमाण पत्र फेसबुक पर अपलोड करते हैं। जब मिलते हैं तो अपने रसूख की शान बघारते हैं। कहते हैं कि देश के लगभग राज्यों से उन्हें प्रशंसा-पत्र मिले हैं। उनसे कोई यह पूछे कि उन्होंने ऐसा क्या किया, जिससे आपकी इतनी प्रशंसा हो रही है। दरअसल पं्रशंसा-पत्र बांटने वाले अवसर को भुनाते हुए अपना नाम चमकाने में लगे हैं। जिन हजारों लोगों को वे प्रशंसा-पत्र बांट रहे हैं, वे उनकी संस्था को सबसे बड़ी समाजसेवी संस्था बताते हैं। प्रशंसा-पत्र पाने वाले और बांटने वाले दोनों महान कोरोना योद्धा बन बैठे हैं। संकट के दौर में मिलीभगत का इससे बड़ा और उदाहरण ना मिलेगा।
महामारी में जो लाचारी पसरी हुई है। रोजगार छिनने के बाद जो लोग सडक़ों पर आ गए हैं। उनका भी राम ही रखवाला है। सारी स्थितियों को नजदीकी से देख रहे और लोगों की मदद कर रहे लोग कुढ़ते रहें तो कुढ़ते रहें। अपनी तो सरकार भी पल्ला झाड़ चुकी है। कोरोना योद्धा तो कर ही क्या सकते हैं। हां सरकार भी प्रशंसा-पत्र ही दे सकती है। अपने नेता जी ने तो लॉकडाउन शुरू होते ही प्रशंसा-पत्र बांटने शुरू कर दिए थे। उनकी सिफारिश पर प्रशासन ने भी अपनी वैबसाइट पर योद्धाओं की सूची डाल दी थी। रोजगार व अन्य सहायता तो मिल नहीं सकती। हाँ, कोई प्रशंसा-पत्र चाहिए, तो मिल जाएगा। वो भी बिना कुछ करे-धरे।
मो.नं.-9466220145
PRAVASI SANDESH 09-09-2020

JAMMU PARIVARTAN 09-09-2020

 
NABH CHHOR 8-9-2020


Thursday, September 3, 2020

पीपीपी! PPP

 व्यंग्य

एक के बाद दूसरा पीपीपी! 

अरुण कुमार कैहरबा

HARI BHOOMI

एक पीपीपी से तो पहले से ही परेशान थे, अब एक नया पीपीपी कोरोना महामारी के ऐन चरमकाल में फन फैलाए खड़ा है। पहले पीपीपी की फुल फॉर्म है-पब्लिक प्राईवेट पार्टनर्शिप और दूसरे की-परिवार पहचान पत्र। ना तो पहला पीपीपी अपने आप उपजा था और  ना ही दूसरा पीपीपी।

इस नए दौर में जन्मा पहला ‘पीपीपी’ शब्द सत्ताधारी नेताओं के भाषणों में अपनी पूरी चमक-दमक के साथ आता है। सीएम, ईएम और सारे एम एक सुर में पीपीपी का राग अलापते हुए पाए जाते हैं। बहुत बड़ी आबादी को तो पीपीपी के मायने तक नहीं पता होते। लेकिन जब वे मंत्रियों के मुख से पीपीपी सुनते हैं तो उन्हें लगता है जैसे वे उन्हें पीने के लिए कह रहे हों। और भक्तजन तो इतने से ही मदमस्त हो जाते हैं कि भई वाह मंत्री जी हों तो ऐसे, जो लोगों को कुछ ना कुछ पिला देना चाहते हैं। हमारे मंत्री जी तो सेवक हैं। तीन बार आया ‘पी’ तो कमाल की स्वरबंदी, जुगलबंदी और आनुप्रासिकता के साथ आता है कि कितने ही लोग वाह-वाह कह उठते हैं। एक ‘पी’ तो पीने का आह्वान करता है लेकिन एक साथ तीन बार पी-पी-पी दर्शाता है कि जो नहीं भी चाहें तो उन्हें भी एम लोग पिलाकर ही मानेंगे। जो रह गए हैं वे भी पीपीपी के लिए तैयार ही रहें। अब तो रेलवे को भी तेज गति से पीपीपी के अनुकूल कर दिया जाएगा।
वैसे तो पीपीपी के चाहे जो मायने निकाल लें। पहली बार सुनने वाला तो यह भी समझ सकता है कि प्राईवेट सैक्टर को पब्लिक के हवाले कर दिया जाएगा। कोई समझ सकता है कि मिलकर चलना ही भारतीय संस्कृति है। प्राईवेट पब्लिक के साथ चले और पब्लिक प्राईवेट के साथ तो इसमें दिक्कत भी क्या है। शरीफ लोग तो यही मानेंगे कि यह मिलवर्तन होना ही चाहिए। लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। चूंकि प्राईवेट सैक्टर मतलब बड़ी पूंजी संचालित कारपोरेट कंपनियों व घरानों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में काफी मेहनत की है। उन्होंने चुनाव रूपी लोकतंत्र के पर्व में अपना माल लगाया होता है। सरकार बनाने में उन्होंने पैसे को पानी की तरह से बहाया है। अब भला मजा लेने में वे पीछे कैसे रह सकते हैं। उन्हें भी तो मजा आना चाहिए। उनके बार-बार आग्रहपूर्वक आदेश के बाद पीपीपी की मदमस्त करने वाली शब्दावली में यह नीति आई है तो इसकी पालना करना प्रत्येक नागरिक का परम दायित्व बनता है। इसलिए देशभक्ति का तकाजा है कि कारपोरेट कंपनियों के आदेश पर बनाई गई पीपीपी की नीति की जन-जन को पालना करनी चाहिए और देशभक्ति का परिचय देना चाहिए।


जैसाकि पहले बताया जा चुका है नई पीपीपी है- परिवार पहचान पत्र। इतने तरह के पहचान-पत्रों के धूमधड़ाके में इस नए पत्र का आगमन हुआ है। यह भी सरकार के नवाचार और नई सोच का ही नतीजा है कि अब लोगों के पास एक नया पहचान पत्र होगा। नियमित रूप से नए-नए पहचान-पत्र मिलने से लोग खुश होते हैं। इसके बनवाने में जनता का टाईम पास भी हो जाता है। कोरोना काल में ताली-थाली, दीए-बाती और आतिशबाजी के उत्सवों के बाद में लोगों को नए काम में लगाने की अत्यधिक आवश्यकता महसूस की जा रही थी। वैसे तो लोगों के टाईम-पास के लिए भाषणों की नियमित व्यवस्था की जाती है। लेकिन निरे भाषणों से काम कहां चलता है। ऐन लॉकडाउन घोषित कर दिए जाने के बाद गरीब लोगों को अपने घरों में जाने के लिए एक मेहनत करनी पड़ी थी तो खतरों से खेलते हुए प्रवासी कही जाने वाली गरीब जनता में साहसिकता के गुण पैदा हुए थे। अब जब पीपीपी का काम शुरू हुआ है तो लोगों के पास नया अवसर है कि वे अपने काम-काज छोड़ कर अपने सभी दस्तावेज उठाकर आ जुटें स्कूलों में। ना तो वैबसाईट चले और ना ही आसानी से पीपीपी पूरा हो। आओ सब मिलकर एक  नए पीपीपी की पालना करें और एक नए पीपीपी का इंतजार करें।
PRAVASI SANDESH MUMBAI

JAMMU PARIVARTAN 4-9-2020

DAINIK SWADESH 4-9-2020


शिक्षा का केन्द्रीय किरदार, जिसकी पीठ पर लदा है भार!

अध्यापक दिवस पर विशेष व्यंग्यात्मक लेख

शिक्षा सम्मान का हकदार, बना फिरे है ठेकेदार! 

अरुण कुमार कैहरबा

फिर आ गया अध्यापक दिवस। गुरूजनों के गुण गाने का दिन। इस बार इस दिन पर कोरोना महामारी की छाया है। स्कूल और कॉलेज बंद हैं। अधिकतर निजी शिक्षण-संस्थानों ने गुरूजनों को घर का रास्ता दिखा दिया है। बाकी जो बचे हैं उनके लिए विद्यार्थियों से सम्पर्क का केवल डिजीटल माध्यम है। सरकारी स्कूलों के जिन विद्यार्थियों के पास एंड्रोयड फोन आदि नहीं है, वे तो अध्यापकों द्वारा भेजे जा रहे संदेशों से वंचित ही हो रहे होंगे। शिक्षा विभाग ने अध्यापकों के विवेक पर अविश्वास की अपनी परंपरा का निर्वहन करते हुए अध्यापकों को अध्यापक दिवस पर निबंध आदि की प्रतियोगिता आयोजित करने के आदेश-निर्देश दे दिए हैं। इससे अध्यापकों पर विभाग के कहे अनुसार ही कार्य करने का दबाव बना रहेगा। निबंध में विद्यार्थी गुरूजनों की महिमा गाते रहेंगे और जिन-जिन नेताओं को अध्यापक दिवस में मुख्य अतिथि बनने का अवसर मिलेगा, वे कुछेक अध्यापकों को सम्मानित करने की औपचारिकता के बाद अध्यापकों को राष्ट्र-निर्माता आदि कहते हुए उन्हें अपने प्राचीन गौरव को पुन: स्थापित करने का उपदेश देकर चलते बनेंगे। अगले दिन अखबारों में नेताओं के भाषण सुर्खियों में होंगे।

कहने को तो अध्यापक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का केन्द्रीय किरदार है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी उसे भविष्य निर्माता और राष्ट्र-निर्माता आदि संज्ञाओं से अभिहित किया गया है। लेकिन भले ही अध्यापक कितने ही कार्य करते हुए बच्चों की उपलब्धियों और स्कूलों के सौंदर्यीकरण के कीर्तिमान रचते रहें, इस व्यवस्था के लिए उसकी हैसियत एक कर्मचारी से अधिक नहीं है। यदि वह भली-भांति दिए गए कार्य कर देता है तो वह ज्यादा दूध देने वाली गाय के समान है, जाकि कभी-कभी सींग तो हिलाती है, लेकिन लात नहीं मारती। अध्यापक एक खूंटी है कि उस पर कुछ भी टांग दो। वह कभी मना नहीं करेगा। वह ऐसा निरीह प्राणी है कि उस पर कुछ भी लाद दो, वह विरोध नहीं करेगा। 

देश के अधिकतर राज्यों में सरकार व विभाग के लिए अध्यापक का पढऩे-पढ़ाने का काम गौण है। सैद्धांतिक तौर पर चाहे जो मर्जी कहा जाता हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से शिक्षण के मामले में भी वह परीक्षा पास करवाने वाले एजेंट से अधिक नहीं है। पढऩे-पढ़ाने के काम को इतना संकुचित कर दिया गया है कि वह काम डायरी में लिखा जरूर होना चाहिए। भले ही वह कक्षा में जा भी ना पाया हो। आईये देखते हैं विभाग की नजर में अध्यापकों के मुख्य काम क्या हैं? स्कूल में भवन, कमरों और शौचालयों का निर्माण अध्यापकों को करवाना होता है। बजट जारी होने के बाद ईंट, बजरी, सीमेंट, रोड़ा व निर्माण सामग्री खरीदना, मिस्त्री व मजदूर ढूंढऩा और उसकी दिहाड़ी को लेकर मोल-भाव करना, निर्माण कार्य शुरू होने से लेकर खत्म होने तक कितने ही काम होते हैं, इसके बारे में घर में काम करने वाले अनुभवी लोगों को ज्यादा पता है। बीच-बीच में विभाग के इंजीनियरों व अधिकारियों के आगमन पर उनकी सेवा-पानी करना और कमीशन ससम्मान घर पर पहुंचाना भी बड़ा काम है। बिना कमीशन दिए ईमानदारी से कार्य करवाने के प्रति जरा भी अडिय़ल रूख दर्शाने पर अधिकारियों की गाज गिरने का खतरा भी उठाना पड़ेगा। एक-एक बिल संग्रह करना, मिस्त्री-मजदूरों की दिहाड़ी आदि का लिखित ब्यौरा बनाना भी इस काम का हिस्सा है। बार-बार इस तरह के कार्य करवाने वालों के साथ हादसा यह होता है कि वे ठेकेदार बन जाते हैं और अध्यापक कहीं गायब हो जाता है। 

कुछ गुरूजन डाकिए बने घूमते हैं। हर रोज थोक में डाक आती हैं और डाक मांगी जाती हैं। भले ही जानकारी का आपके स्कूल से कोई संबंध ना हो। आपको भी जवाब भेजना पड़ेगा, भले ही शून्य करके भेजना हो। स्कूल में अध्यापकों का टोटा है। कक्षाएं पहले ही खाली हैं। लेकिन यदि बीईओ या डीईओ कार्यालय में कोई मीटिंग आहुत की गई है तो फिर उसमें जाना ज्यादा जरूरी है। बच्चे जाएं भाड़ में। आप चाहें तो अघोषित रूप से बच्चों की छुट्टी कर दें। मीटिंग में खाली हाथ तो जाने से रहे। इससे पहले आपको कईं तरह के दस्तावेज तैयार करने होंगे, जो मीटिंग में जमा करवाने हैं।

सफाई कर्मचारी ना होने पर स्कूल प्रांगण, कक्षा-कक्ष व शौचालयों की सफाई करना तो बेहद जरूरी है। चाहे जैसे करें। आखिर स्वच्छता पर तो पढ़ाई से ज्यादा ही बल है। होना भी चाहिए क्योंकि स्वच्छता के बिना पढ़ाई कैसे होगी? मिड-डे-मील भी स्कूल का महत्वपूर्ण पक्ष है। मिड-डे-मील में भी कोई चूक नहीं होनी चाहिए। स्कूल में आने से पहले सब्जी मंडी से सब्जियां लेकर जानी होंगी। गुरू जी कक्षा में हैं कि मिड-डे-मील वर्कर ने आकर बताया कि सिलैंडर खत्म हो गया तो कक्षा छोड़ कर सिलैंडकर का प्रबंध कीजिए। गेहूँ पिसवाकर आईये। रजिस्टर में एक-एक बच्चे के खाने में मिड-डे-मील में डाली गई हल्दी-नमक-तेल आदि का हिसाब दर्ज होना सबसे ज्यादा जरूरी है। इसमें देरी होने पर तो गुरूजी के ऊपर गाज गिरना लाजिमी समझो। चुनाव, जनगणना, पल्स पोलियो अभियान में दो बूंद जिंदगी की, अलग-अलग अवसरों पर होने वाले सर्वेक्षण और जागरूकता अभियान सभी तो गुरूजी के भरोसे होते हैं। समय-समय पर वोटर-लिस्ट संभालने, नई वोटें बनवानें, वोटें कटवाने आदि का काम करने के लिए बीएलओ नाम का पद कौन संभाले। मास्टर जी और मास्टरनी जी को दे दो। सब संभाल लेंगे। साल में दो-तीन हजार का मानदेय देने पर तो गुरूजी को गुलाम समझो। बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) का रूतबा क्या काम है। हर समय वोटर-लिस्ट उठाए घूमते रहो। यह बीएलओ का पद ना आया होता तो गुरूजी कभी अफसर ही ना बन पाते।

बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न अध्यापकों द्वारा किए जाने वाले कार्यों की लंबी फेहरिस्त है। कोरोना महामारी के इन दिनों में अध्यापकों ने स्वैच्छिक रूप से ऑनलाइन शिक्षा के जरिये बच्चों के विकास के लिए कार्य शुरू किया तो विभाग को लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है। स्कूल खोलने की जल्दबाजी का परिचय देते हुए अधिकारियों ने अध्यापकों को अवश्य ही स्कूल में आने के आदेश दिए। अब जब महामारी भयंकर रूप धारण करती जा रही है तो अध्यापकों को आठ दिन के अंदर-अंदर परिवार पहचान पत्र (पीपीपी) बनाने के आदेश दिए। बिना किसी प्रशिक्षण के अध्यापक पीपीपी में लगे हैं। वैबसाईट चल नहीं रही, सर्वर डाउन है तो भी अध्यापक लगे हुए हैं। परिवार के सभी सदस्यों के सभी प्रमाण-पत्र जुटाकर प्राप्त करना, उनके रिकॉर्ड दर्ज करना, स्कैन करना और फिर बंद प्राय: वैबासाईट में माथा-पच्ची करना यह सब कार्य अध्यापकों की अथाह सहनशीलता के द्योतक हैं। यही नहीं इसी बीच एक स्थान पर शराबियों व नशेडिय़ों की सूची बनाने के आदेश अध्यापकों को दे दिए गए। जो काम कोई ना कर पाए, वह अध्यापकों को दे दो। अध्यापक ना हुए कि अलादीन के चिराग हो गए कि हुक्म दो और काम लो।

गुरूजनों की महिमा अनंत है। आखिर हर आदेश को बिना ना-नुकूर के पूरा करने वाले गुरूजनों को प्रणाम कहने का मन करता है। क्या अध्यापक डर के साए में हैं। यदि वास्तव में यह सच है तो बच्चों को निर्भीक कैसे बनाएंगे। बच्चों को विचारशील, कल्पनाशील, क्रियाशील बनाते हुए उनकी प्रतिभा के विकास के लिए जमीन कैसे देंगे। सवाल है बाकी अध्यापक दिवस है। एक-दूसरे को बने-बनाए अच्छे-अच्छे संदेश व्हाट्सअप कीजिए। अध्यापक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

मो.नं.-9466220145  



AAJ SAMAJ 5-9-2020


Wednesday, September 2, 2020

NEW EDUCATION POLICY 2020 शिक्षा ढ़ांचे में होगा बुनियादी बदलाव

 राष्ट्रीय शिक्षा  नीति-2020

शिक्षा ढ़ांचे में होगा बुनियादी बदलाव

10+2 के स्कूली ढ़ांचे का स्थान लेगा 5+3+3+4

प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा को लेकर हुए महत्वपूर्ण प्रावधान

मिड-डे-मील में बच्चों को नाश्ता भी मिलेगा


अरुण कुमार कैहरबा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में स्कूली शिक्षा ढ़ांचे में बड़ा बदलाव करने का प्रस्ताव है। इसमें 10+2+3 के शैक्षिक ढ़ांचे को पूरी तरह बदल दिया गया है। पहले 10+2 स्कूली शिक्षा से संबंधित था और जमा 3 स्नातक की पढ़ाई के लिए दिया गया था। 10+2 के अनुसार पढ़ाई छह साल से शुरू होती थी। शिक्षा के अधिकार को लेकर किए गए संविधान संशोधन में भी छह से 14 साल तक की शिक्षा को अधिकार बनाया गया। बाद में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में भी छह साल की उम्र में पहली कक्षा से लेकर 14 साल तक आठवीं कक्षा तक शिक्षा को अधिकार में शामिल किया गया था।  अब स्कूली ढ़ांचा 5+3+3+4 के हिसाब से होगा। इसका मतलब है कि अब स्कूली शिक्षा को 3-8, 8-11, 11-14, और 14-18 उम्र के बच्चों के लिए बांटा गया है। इसमें तीन से लेकर आठ साल के बच्चों के लिए पांच साल की नर्सरी से दूसरी कक्षा तक एक हिस्सा, आठ से 11 साल के बच्चों के लिए तीसरी से पांचवीं तक दूसरा हिस्सा, छठी से आठवीं तक तीसरा हिस्सा और नौंवी से 12वीं तक आखिरी हिस्सा होगा।  यह महत्वपूर्ण है कि देश में ही अधिकतर बच्चों की शिक्षा ढ़ाई-तीन साल की उम्र में ही शुरू होती है। साधन-सम्पन्न वर्ग काफी पैसा खर्च करके नर्सरी या प्री-प्राइमरी प्ले स्कूलों में अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करता है। निजी स्कूलों में पूर्व प्राथमिक कक्षाओं के लिए अलग से सुसज्जित भवन बनाए गए हैं, जहां पर केजी, एलकेजी व यूकेजी आदि कक्षाएं लगाई जाती हैं। विभिन्न चरणों से होते हुए बच्चे पहली कक्षा तक पहुंचते हैं। इन निजी संस्थानों की अलग-अलग श्रेणियां हैं तथा गुणवत्ता व शुल्क के भी कईं स्तर हैं। बहुत से स्कूलों में लाखों रूपये की डोनेशन फीस जमा करवाकर बच्चों को दाखिल करवाया जाता है। अधिकतर निजी स्कूलों में पालकों पर आर्थिक बोझ तो बहुत अधिक पड़ता है, लेकिन पढ़ाई की बात करें तो ऊंची दुकान-फीके पकवान वाली कहावत चरितार्थ होती है।

कहने को तो सरकारी स्तर पर भी आंगनवाडिय़ां बनाई गई हैं, जोकि बच्चों को पूर्व प्राथमिक शिक्षा, पोषाहार, स्वास्थ्य आदि के लिए ही शुरू हुई थी। शिक्षाविदों और बाल-विशेषज्ञों ने इसकी जरूरत और गुणवत्ता को रेखांकित किया है। लेकिन सच्चाई यह है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को दिए गए विभिन्न प्रकार के कार्यों के कारण वे पढ़ाई का कार्य नहीं करवा पाती हैं। आंगनवाड़ी केंद्र में सुविधाओं का अभाव व गैर-शैक्षिणक कार्यों में कर्मियों की अत्यधिक व्यस्तता के कारण समाज के एक हिस्से ने तो उनसे पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है। बहुत कम उम्र में ही निजी संस्थानों में चले गए बच्चों का अपने स्कूलों के साथ लगाव भी होता है और फिर पहली कक्षा में अच्छी शिक्षा की व्यवस्था होने के बावजूद उनका सरकारी स्कूलों में आना संभव नहीं हो पाता। सरकारी स्कूलों में बच्चों की कम होती संख्या का यह एक बड़ा कारण साबित होता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि राजकीय पाठशालाओं के अध्यापकों ने प्रयास ना किए हों। प्रावधान नहीं होने के बावजूद बहुत सारे राजकीय स्कूलों ने अपने स्तर पर नर्सरी कक्षाएं चलाई हैं। इसके लिए पंचायतों व समुदाय का सहयोग लेकर स्वैच्छिक शिक्षकों को भी रखा जाता है। जिन स्कूलों ने अपने स्तर पर पहलकदमी करते हुए यह व्यवस्था की है, उन स्कूलों में बच्चों की संख्या में भी बढ़ौतरी हुई है। पूर्व प्राथमिक कक्षा के लिए दाखिल किए गए बच्चों को मिड-डे-मील से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके लिए औपचारिक रूप से व्यवस्था नहीं होने के बावजूद आपसी सहयोग से अध्यापक यह प्रबंध करते हैं। अध्यापक लंबे समय से प्राथमिक स्कूलों में नर्सरी कक्षाएं लगाए जाने और उसके लिए अध्यापकों की व्यवस्था करने की मांग कर रहे हैं।

अब जब यह समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी थी तो नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्कूल शिक्षा ढ़ांचे में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए तीन से छह साल तक के बच्चों को समाहित करना एक सुखद अहसास कराने वाला है। हालांकि यह भी तय है कि इसे लागू करने में जितनी देरी होगी, उतना ही नुकसान बढ़ता जाएगा। नीति में कहा गया है कि बच्चे के मस्तिष्क का 85 प्रतिशत विकास छह वर्ष से पहले ही हो जाता है। इसलिए बच्चों के शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास के लिए जीवन के पहले छह वर्ष काफी महत्वपूर्ण होते हैं। समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण समाज के सबसे वंचित वर्ग के बच्चे गुणवत्तापूर्ण पूर्व प्राथमिक शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। इस तरह से वे समान रूप से शिक्षा प्रणाली में हिस्सा लेने के अपने अधिकार से भी वंचित हो रहे हैं।

शिक्षा नीति में प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई) को सीखने की नींव बताया गया है। सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित जो करोड़ों बच्चे गुणवत्तापूर्ण ईसीसीई से वंचित हो रहे हैं। उनके लिए निवेश को बढ़ाने की बात भी की गई है। ईसीसीई के लिए दो भागों में उत्कृष्ट पाठ्यक्रम एवं शैक्षिक ढ़ांचा विकसित करने की जिम्मेदारी एनसीईआरटी को दी गई है। पहले भाग में 0-3वर्ष तक के बच्चों के लिए सब-फे्रमवर्क और दूसरे भाग में 3-8 वर्ष तक के लिए सब-फ्रेमवर्क बनाया जाएगा। इसके लिए बाल्यावस्था में देखभाल के लिए स्थानीय परंपराओं और भारत में प्राचीन काल से चली रही परंपराओं के अनुकूल राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय नवाचार पर शोध किया जाएगा। ईसीसीई में कला-शिल्प, कहानियां, कविता, गीत और खेल सब कुछ शामिल होंगे। प्रारंभिक बाल्यावस्था के लिए विकसित किया जाने वाला यह मॉडल माता-पिता और आंगनवाडिय़ों के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य करेगा। इसके लिए उच्चतर गुणवत्ता के ईसीसीई संस्थान स्थापित किए जाएंगे, जिनके द्वारा ईसीसीई प्रणाली को पहले से चल रहे आंगनवाड़ी केन्द्रों, स्कूलों में चल रहे आंगनवाड़ी केन्द्रों, प्राथमिक पाठशालाओं, प्री-प्राईमरी स्कूलों, प्ले स्कूलों के माध्यम से लागू किया जाएगा। इसके लिए ईसीसीई पाठ्यक्रम में प्रशिक्षित कर्मचारियों व शिक्षकों की भर्ती करने की बात भी कही गई है।

लचीली, बहु आयामी, खेल आधारित, गतिविधि आधारित व खोज आधारित प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम विकास एवं शिक्षण-विधि की सारी जिम्मेदारी मानव संसाधन विकास मंत्रालय की होगी। ईसीसीई का स्कूलों में सहज एकीकरण एवं मार्गदर्शन को बढ़ावा देने के लिए एक टास्क फोर्स गठित की जाएगी। ईसीसीई के आयोजन एवं क्रियान्वयन में शिक्षा मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और जनजाति कार्य मंत्रालय मिलकर कार्य करेंगे। 

वर्तमान में आंगनवाड़ी केन्द्रों में आने वाले बच्चों की शिक्षा के जिन विविध पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया जाता। उन पर विशेष ध्यान केन्द्रित करने की बात की गई है। मजबूत प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा के अभाव में बहुत से बच्चे बुनियादी साक्षरता व भाषा ज्ञान व संख्या ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। वर्तमान प्राथमिक पाठशालाओं में पूरे देश में ऐसे बच्चों की अनुमानित संख्या 5 करोड़ है। यह सीखने की एक गंभीर समस्या है। यह समस्या बाल्यावस्था को बोझिल बनाते हुए निराशा से भर देती है और अंत में बच्चे ड्रॉपआउट कर जाते हैं। शिक्षा नीति में तीसरी कक्षा तक अनिवार्य रूप से मूलभूत साक्षरता एवं संख्या ज्ञान प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय अभियान बनाए जाने का संकल्प किया गया है। इसके लिए 2025 तक प्राथमिक विद्यालयों में सार्वभौमिक मूलभूत साक्षरता एवं संख्या ज्ञान को शिक्षा प्रणाली की सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया गया है और इसके लिए राष्ट्रीय मिशन स्थापित करने की भी बात की गई है। इस महत्वपूर्ण एवं महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए निश्चय ही स्कूलों में अध्यापकों की कमी एक बड़ी समस्या है। इसके लिए अध्यापकों की भर्ती और प्राथमिक स्कूलों में विद्यार्थी-अध्यापक अनुपात 30:1 से कम और जिन स्कूलों में वंचित समुदाय के बच्चों की अधिकता होती है, उनमें यह अनुपात 25:1 से कम होगा। बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान में बच्चों को पारंगत बनाने के लिए सतत रचनात्मक मूल्यांकन पद्धति अपनाए जाने और बच्चों के सीखने को ट्रैक करने की नीति अपनाई जाएगी। द डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर फॉर नॉलेज शेयरिंग (दीक्षा) पर इससे संबंधित उच्चतर गुणवत्ता वाली सामग्री का राष्ट्रीय भंडार उपलब्ध करवाया जाएगा। अध्यापकों के सतत व्यावसायिक विकास एवं प्रशिक्षण के लिए डिजीटिल माध्यमों का इस्तेमाल किया जाएगा। बच्चों के सीखने को आनंददायी बनाने के लिए अध्यापकों के कुशल मार्गदर्शन में पीयर ट्यूटरिंग को बढ़ावा दिया जाएगा। 

शिक्षा नीति में पढऩे की संस्कृति को विकसित करने के लिए स्कूली पुस्तकालयों को विकसित करने और नए पुस्तकालयों की स्थापना और उनमें बालोपयोगी उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तकों की उपलब्धता बढ़ाई जाएगी। बच्चों के स्वास्थ्य के लिए उनकी स्वास्थ्य जांच नियमित रूप से की जाएगी। 

बच्चों के शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास के लिए और सीखने को बढ़ावा देने के लिए पौष्टिक भोजन का महत्वपूर्ण स्थान है। गरीबी और बेरोजगारी की दशा का बच्चों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। आज भी बहुत से बच्चे भूखे पेट स्कूलों में आते हैं। उनके लिए मिड-डे-मील ही सहारा होता है। मिड-डे-मील के कारण परिजन भी आश्वस्त होते हैं। मिड-डे-मील योजना को बढ़ाने के लिए माध्याह्न भोजन के साथ-साथ पौष्टिक नाश्ते की जरूरत को शिक्षा नीति ने रेखांकित किया है। सुबह के भोजन के लिए भोजन पकाने की व्यवस्था नहीं होने की स्थिति में अन्य पोषहार व फल आदि उपलब्ध करने की बात की गई है। 

इस तरह से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 स्कूली शिक्षा में बहुत से महत्वपूर्ण प्रावधान कर रही है। तीन वर्ष के बच्चों के प्रति प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा के रूप में राष्ट्रीय जिम्मेदारी का विस्तार करके महत्वपूर्ण प्रावधान कर रही है। हालांकि इसको स्कूलों के साथ समेकित किया जाना भी बहुत जरूरी है। आंगनवाडिय़ां स्कूलों से अलग-थलग नहीं होनी चाहिएं। इसे शीघ्रता से लागू किए जाने की तरफ बढऩा चाहिए। इसके लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम में तीन साल से 18 साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार का विस्तार करते हुए संशोधन किया जाना चाहिए। यह भी देखने में आता है कि नीतियां बन तो जाती हैं, लेकिन इन्हें लागू होने में वर्षों लग जाते हैं। जिससे शिक्षाविदों की सारी बातें कागजों में सिमट कर रह जाती हैं। 







Monday, August 31, 2020

Staff honored on the retirement of head teacher Usha Rani

 मुख्य शिक्षिका उषा रानी की सेवानिवृत्ति पर स्टाफ ने किया सम्मानित

समारोह में मुख्य शिक्षिका ने सांझे किए अनुभव

यमुनानगर 31 अगस्त

गांव करेड़ा खुर्द स्थित राजकीय प्राथमिक पाठशाला की मुख्य शिक्षिका उषा रानी अपने 31 वर्ष से अधिक लंबे कार्यकाल के बाद सेवानिवृत्त हो गई। स्कूल में आयोजित समारोह में स्टाफ सदस्यों ने उन्हें सम्मानित करते हुए भावभीनी विदाई दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्याध्यापिका ओम प्रभा शर्मा ने की और संचालन हिंदी प्राध्यापक अरुण कुमार कैहरबा ने किया। कार्यक्रम का संयोजन वरिष्ठ प्राथमिक शिक्षक वीरेंद्र कुमार और किशोरी लाल ने किया।


स्टाफ सदस्यों को संबोधित करते हुए सेवानिवृत्त हुई मुख्य शिक्षिका उषा रानी ने अपने अनुभव सांझा करते हुए कहा कि उन्होंने बच्चों को कभी अपनी बात कहने से नहीं रोका। बच्चों को अभिव्यक्ति के अवसर मिले तो उनका उनके ऊपर विश्वास भी बढ़ा और इससे सीखने सिखाने की प्रक्रिया और ज्यादा सघन हुई। उन्होंने कहा कि यदि हम बच्चों पर भरोसा करेंगे तो बच्चे भी हमारे ऊपर विश्वास करेंगे। उन्होंने कहा के उनके विद्यार्थी अपने घर की समस्याएं भी उनके साथ बिना किसी संकोच के सांझा करते हैं। यही उनकी ताकत है। उन्होंने अध्यापकों का आह्वान किया कि बच्चों के विकास के लिए मिलजुल कर कार्य करें। 


मुख्याध्यापिका ओम प्रभा ने उषा रानी को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि अध्यापक दीपक के समान स्वयं जलते हुए विद्यार्थियों के जीवन में रोशनी फैलाता है। उषा मैडम ने अपने कार्यों में विद्यार्थियों का हित सर्वोपरि रखा। अरुण कैहरबा ने कहा कि अध्यापक एक कर्मचारी और परीक्षा पास करवाने वाला अर्जेंट नहीं होता। उसका दर्जा इनसे कहीं ऊंचा है। वह अपने व्यवहार के द्वारा समाज और बच्चों को मूल्य स्थानांतरित करता है। अंग्रेजी प्राध्यापक संदीप कुमार ने कहा कि उषा मैडम से उन्हें सदैव अपनापन मिला। वे बेटा-बेटा करके पुकारती हैं कि सिर स्वमेव श्रद्धावनत हो जाता है। मौलिक मुख्याध्यापक विष्णु दत्त ने उषा मैडम के व्यक्तित्व में कर्मठता निष्ठा और ईमानदारी जैसे मूल्यों को रेखांकित किया।


विज्ञान अध्यापक ओमप्रकाश ने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद सक्रिय और स्वस्थ रहना काफी लाजमी है। इसके लिए हमें योजना बनाकर के कार्य करना चाहिए। संस्कृत अध्यापिका रजनी ने कहा के उषा मैडम आदर्श अध्यापिका हैं। उन्हें उनके साथ कई वर्षों तक काम करने का मौका मिला है और उन्होंने उन्हें हमेशा बच्चों के हित में कार्य करते हुए पाया है। वीरेंद्र कुमार ने कहा कि उषा मैडम की उपस्थिति में पूरे स्टाफ को इसी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी। वे हमेशा अपने कार्यों में तल्लीन रहते हुए अध्यापकों को प्रेरणा देने का कार्य करती थी।


ओम प्रभा के नेतृत्व में उषा रानी उनके सुपुत्र अजय कुमार और बेटी राधिका का पूरे स्टाफ ने फूल मालाओं के साथ जोरदार स्वागत किया। स्टाफ की ओर से उन्हें सम्मानित किया गया। सेवानिवृत्त मुख्य शिक्षिका ने उनको 21 सौ रुपए दान स्वरूप भेंट किए और इनका प्रयोग स्कूल के हित में करने का संदेश दिया। इस मौके पर लिपिक मंजू, कंप्यूटर अध्यापिका डिंपल, एलए रवि कुमार, राजेंद्र कुमार, पाला राम उपस्थित रहे।